मुंबई, छह अप्रैल (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की द्विमासिक मौद्रिक नीति पर विचार करने के लिए तीन दिन चलने वाली बैठक सोमवार को शुरू हुई। यह मौजूदा वित्त वर्ष की पहली द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा बैठक है।
यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया संकट के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच नीतिगत दर को यथावत रखने की संभावना है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) का निर्णय बुधवार को घोषित किया जाएगा।
आरबीआई ने फरवरी, 2025 से अब तक नीतिगत दर रेपो में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की है। यह 2019 के बाद से सबसे बड़ी कटौती है। आरबीआई ने आखिरी बार बीते साल दिसंबर रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती की थी। पिछली बैठक फरवरी में यथास्थिति बनाए रखी गयी थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, एमपीसी के सदस्य पश्चिम एशिया में जारी तनाव, जिंस कीमतों में अस्थिरता और घरेलू मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखेंगे।
उन्होंने कहा कि खुदरा मुद्रास्फीति आरबीआई के चार प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य के करीब पहुंच गई है, लेकिन वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में हाल में आई तेजी ने घरेलू कीमतों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
एक अनुमान के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि से मुद्रास्फीति 0.60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है।
कच्चे तेल की कीमत लंबे समय से लगभग 60 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं। फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद से यह बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है।
इसके अलावा, युद्ध के बाद से रुपये का मूल्य चार प्रतिशत से अधिक टूटा है, जिसका असर आयातित मुद्रास्फीति पर भी पड़ा है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केंद्रीय बैंक आगामी समीक्षा में अपने मौजूदा तटस्थ रुख को बरकरार रखेगा, जो मुद्रास्फीति की बदलती परिस्थितियों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती को बनाए रखने की प्राथमिकता को दर्शाता है।
भाषा रमण अजय
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