बेरोजगारी की स्थिति गंभीर; चीनी निवेश की अनुमति से रोजगार, विनिर्माण को मिलेगा बल: गर्ग

बेरोजगारी की स्थिति गंभीर; चीनी निवेश की अनुमति से रोजगार, विनिर्माण को मिलेगा बल: गर्ग

बेरोजगारी की स्थिति गंभीर; चीनी निवेश की अनुमति से रोजगार, विनिर्माण को मिलेगा बल: गर्ग
Modified Date: May 31, 2026 / 12:20 pm IST
Published Date: May 31, 2026 12:20 pm IST

(राधा रमण मिश्रा)

नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के केंद्र में 12 साल पूरे होने के बीच पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा है कि देश में बेरोजगारी की स्थिति गंभीर है और गलत नीतिगत रूपरेखा के कारण अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का योगदान स्थिर बना हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत में चीन से आने वाले निवेश की अनुमति दी जाए तो हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल और एआई जैसे क्षेत्रों में नए उत्पादों और मशीनों के विनिर्माण में बड़े पैमाने पर गति आ सकती है और रोजगार में वृद्धि हो सकती है।

गर्ग ने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान कुछ आर्थिक सुधार जरूर हुए हैं, लेकिन नीतिगत खामियों के कारण भारत के ‘असुरक्षित और कमजोर अर्थव्यवस्था’ की श्रेणी में पहुंचने का जोखिम बढ़ गया है।

सरकार के पिछले 12 साल के कार्यकाल में रोजगार और विनिर्माण की स्थिति के बारे में पूछे गये सवाल के जवाब में गर्ग ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा, ‘‘देश में बेरोजगारी और अल्प-रोजगार का गंभीर संकट है। सरकार रोजगार के आंकड़ें सही से नहीं दे रही है। पीएलएफएस (निश्चित अवधि पर होने वाला श्रम बल सर्वेक्षण) के आंकड़ों से रोजगार में जो वृद्धि दिखाई देती है, वह लगभग कृषि क्षेत्र में वृद्धि और पारिवारिक उद्यमों में अवैतनिक सहायकों (बिना कोई पारिश्रमिक लिए पारिवारिक कामगार) के एक विशेष वर्ग के कारण है।’’

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा, ‘‘कोई भी सरकार किसी भी स्थिति में रोजगार के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। उसे ऐसी परिस्थितियां बनानी चाहिए जिससे निजी क्षेत्र रोजगार सृजित कर सकें।’’

विनिर्माण क्षेत्र के बारे में गर्ग ने कहा, ‘‘विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग स्थिर बनी हुई है। सरकार की नीतिगत रूपरेखा गलत है, जो भारत में विनिर्माण वृद्धि में बाधा डालती है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘सरकार भारत में चीन से आने वाले निवेश की अनुमति नहीं दे रही। अगर इसकी अनुमति दी जाए तो ऊर्जा बदलाव, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), डिजिटल विनिर्माण और एआई आधारित विनिर्माण में नए उत्पादों और मशीनों के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विनिर्माण और रोजगार वृद्धि हो सकती है। सौर ऊर्जा, बैटरी, ईवी आदि में पीएलआई (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) का लगभग न के बराबर कार्यान्वयन अर्थव्यवस्था के इन नये क्षेत्रों में पीएलआई की विफलता को दर्शाता है।’’

आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में योगदान स्थिर बना हुआ है। वर्ष 2014 में विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 16.7 प्रतिशत था जो वर्तमान में करीब 17 प्रतिशत है।

अर्थव्यवस्था की स्थिति पर पूछे गये सवाल पर पूर्व वित्त सचिव ने कहा, ‘‘सरकार के पहले कार्यकाल (मई, 2014 से मई, 2019) में नोटबंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया था। जीडीपी वृद्धि दर अच्छी रही और मुद्रास्फीति में गिरावट आई।’’

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में मई, 2014 में जब राजग सरकार सत्ता में आई थी, उस समय आर्थिक वृद्धि धीमी थी, महंगाई बढ़ी हुई थी, डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर अस्थिर थी और राजकोषीय तथा चालू खाते का घाटा ऊंचा बना हुआ था और तथा फंसे कर्ज की समस्या थी।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कमजोर होने लगा। इसका मुख्य कारण 2020-21 की पहली तिमाही में कोविड के चलते लॉकडाउन लगाना रहा। दूसरे कार्यकाल के पांच वर्षों (2019-24) को मिलाकर देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था ने 1991 के बाद सबसे खराब वृद्धि दर दर्ज की।’’

गर्ग ने कहा, ‘‘इस सरकार का मौजूदा तीसरा कार्यकाल अब तक सबसे खराब रहा है। इसमें वृद्धि दर, रुपया, विदेशी निवेश, सरकार का राजकोषीय प्रदर्शन… सभी आर्थिक मापदंड खतरनाक रूप से नीचे आए हैं। मुद्रास्फीति के काफी बढ़ने की आशंका है। एक समय ”नाजुक पांच’ देशों में शामिल रहे भारत के अब दुनिया में ‘असुरक्षित और कमजोर अर्थव्यवस्था’ वाला देश बनने का खतरा है। हर जगह मिलने वाली मुफ्त सुविधाएं और सब्सिडी के चलते भारत सबसे अधिक सरकार पर निर्भर समाजों में से एक बन गया है।’’

उल्लेखनीय है कि 2013 में भारत समेत पांच देशों को नाजुक अर्थव्यवस्था वाली श्रेणी में रखा गया था। इसका कारण इन देशों का वृद्धि को गति देने के लिए कम भरोसेमंद माने जाने वाले विदेशी निवेश पर अत्यधिक निर्भरता थी।

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली मौजूदा राजग सरकार 26 मई, 2014 को सत्ता में आई थी और नौ जून, 2024 को इसका तीसरा कार्यकाल शुरू हुआ था।

अर्थव्यवस्था को मापने के महत्वपूर्ण मापदंड जीडीपी वृद्धि और मुद्रास्फीति के बारे में पूछे जाने पर गर्ग ने कहा, ‘‘तुलना करना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि समय के साथ परिस्थितियां काफी बदल जाती हैं। फिर भी, वृद्धि के मापदंड पर, जिससे अंतरराष्ट्रीय तुलना भी संभव हो पाती है, वर्तमान अमेरिकी डॉलर मूल्य पर पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार की लगभग छह प्रतिशत की वृद्धि दर मनमोहन सिंह सरकार के दो कार्यकालों की 11 प्रतिशत से अधिक वार्षिक वृद्धि दर से काफी कम है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मोदी सरकार में जीडीपी के रूप में अर्थव्यवस्था 2018-19 में 2.70 ट्रिलियन (2,700 अरब) डॉलर से बढ़कर सात साल में मुश्किल से 3.80 ट्रिलियन (3,800 अरब) डॉलर तक पहुंच पाई है। इससे पांच ट्रिलियन (5,000 अरब) डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य 2028-29 से भी आगे बढ़ गया है (मूल रूप से यह 2024-25 के लिए निर्धारित)। तीसरे कार्यकाल में वृद्धि में तेजी आने की उम्मीद थी, लेकिन अब यह निराशा की तरफ बढ़ता दिख रहा है। सरकार का स्वयं 2023-24 के जीडीपी अनुमान को 12 ट्रिलियन (12,000 अरब रुपये) रुपये तक कम करना वृद्धि के दावे की अस्थिरता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।”

आधार वर्ष 2022-23 के तहत जीडीपी वृद्धि दर 2024-25 में 7.1 प्रतिशत रही जबकि 2025-26 में इसके 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष समेत विभिन्न एजेंसियों ने 2025-26 में वृद्धि दर कम रहने का अनुमान जताया है।

गर्ग ने कहा, ‘‘वहीं मुद्रास्फीति में तेजी देखी जा रही है। इस वर्ष खुदरा और थोक दोनों ही क्षेत्रों में महंगाई के छह-सात प्रतिशत से नीचे रहने की संभावना नहीं है।’’

पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत में खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल में बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो गई, जो मार्च में 3.40 प्रतिशत थी। थोक मुद्रास्फीति भी मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा की बढ़ती लागत के कारण 42 महीनों के उच्चतम स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई।

आर्थिक सुधारों की स्थिति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘सरकार ‘सुधारों’ की बात तो करती है, लेकिन कोई सुधार नहीं करती। निजीकरण कार्यक्रम ठप पड़ा है। कृषि, कच्चे माल और एमएसपी में सुधारों को आगे नहीं बढ़ाने से खेती-बाड़ी एक तरह से सरकारी क्षेत्र बन गया है। सेवा क्षेत्र, विशेषकर खेल, यात्रा, मनोरंजन और निजी सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए बहुत कम प्रयास किए जा रहे हैं। संस्थाएं सही तरीके से काम नहीं कर पा रही। सही मायने में सुधारों के लिहाज से यह 1991 के बाद की सबसे खराब स्थिति है।’’

भाषा रमण

अजय

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