अमेरिका की योग्यता आधारित व्यवस्था ने मुझे बनाया सीईओ, भारत एक स्वाभाविक साझेदारः इंद्रा नूयी

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अमेरिका की योग्यता आधारित व्यवस्था ने मुझे बनाया सीईओ, भारत एक स्वाभाविक साझेदारः इंद्रा नूयी

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  • Publish Date - July 2, 2026 / 10:20 PM IST,
    Updated On - July 2, 2026 / 10:20 PM IST

(योषिता सिंह)

न्यूयॉर्क, दो जुलाई (भाषा) पेप्सिको की भारतीय मूल की पूर्व चेयरमैन एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) इंद्रा नूयी ने कहा है कि अमेरिका की ‘योग्यता-आधारित व्यवस्था’ ने ही उन्हें इतनी बड़ी वैश्विक कंपनी का मुखिया बनने का मौका दिया, जो भारत समेत किसी भी दूसरे देश में संभव नहीं हो पाता।

नूयी ने पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलीजा राइस के साथ बातचीत में कहा कि अमेरिका में प्रतिभा को पहचानने और आगे बढ़ाने की ऐसी व्यवस्था है, जहां लिंग, जातीयता या पृष्ठभूमि से ज्यादा योग्यता मायने रखती है।

उन्होंने इस परिचर्चा में कहा, ‘‘एक प्रवासी भी यहां बिना संसाधनों के आकर शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। यह दुनिया के किसी अन्य देश में संभव नहीं हो पाता। मैं किसी भी अन्य देश, यहां तक कि भारत में भी, सीईओ नहीं बन पाती।’’

येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की पूर्व छात्रा नूयी 12 वर्षों तक पेप्सिको के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) की कमान संभालने के बाद 2018 में पद से हटी थीं। उन्हें आज भी दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली कारोबार दिग्गजों में गिना जाता है।

इसके साथ ही नूयी ने अमेरिका और भारत को ‘स्वाभाविक साझेदार’ बताते हुए कहा कि चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की भूमिका बेहद अहम है।

उन्होंने कहा कि एशिया में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत एक बेहद महत्वपूर्ण देश है, क्योंकि उस क्षेत्र में चीन का वर्चस्व नहीं होना चाहिए।

नूयी ने कहा कि भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ युवा और अंग्रेजी बोलने वाली आबादी के कारण भविष्य में वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर और एआई पेशेवर तथा प्रवासी समुदाय दुनिया के विकास में अहम योगदान देंगे।

उन्होंने भारत और चीन की तुलना करते हुए कहा कि चीन में प्रतिस्पर्धा काफी आक्रामक है और वहां की अधिक केंद्रीकृत व्यवस्था ने उसे तेजी से वैश्विक शक्ति बनने में मदद की।

इसके उलट नूयी ने भारत को ‘अराजकता से भरपूर एक खूबसूरत’ देश बताते हुए कहा, ‘‘भारत अब भी एक वैश्विक शक्ति बनने के लिए संघर्ष कर रहा है, क्योंकि यहां लोकतंत्र है। जब हर व्यक्ति को मत देने और अपनी बात रखने का अधिकार होता है तो प्रगति की गति धीमी हो जाती है, लेकिन मुझे खुशी है कि व्यवस्था ऐसी ही है।’’

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

अजय