दुनिया की आर्थिक ताकत अब पूर्व की ओर बढ़ रही, वैश्विक दक्षिण को अवसरों का लाभ उठाना चाहिए: दास

दुनिया की आर्थिक ताकत अब पूर्व की ओर बढ़ रही, वैश्विक दक्षिण को अवसरों का लाभ उठाना चाहिए: दास

दुनिया की आर्थिक ताकत अब पूर्व की ओर बढ़ रही, वैश्विक दक्षिण को अवसरों का लाभ उठाना चाहिए:  दास
Modified Date: September 29, 2026 / 07:28 pm IST
Published Date: September 29, 2026 7:28 pm IST

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव शक्तिकान्त दास ने मंगलवार को कहा कि दुनिया की आर्थिक ताकत अब पूर्व की ओर बढ़ रही है और वैश्विक दक्षिण के देशों को खाद्य सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा बदलाव जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक रणनीतियां बनाकर इन अवसरों का लाभ उठाना चाहिए।

‘वैश्विक दक्षिण’ के अंतर्गत मोटे तौर पर विकासशील, उभरते और कम औद्योगीकृत देशों को रखा जाता है।

दास ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से ऊर्जा के दाम में तेज वृद्धि हुई है और महंगाई का दबाव फिर बढ़ा है। इससे वैश्विक आर्थिक वृद्धि और वस्तुओं की खरीद करने वाले देशों तथा उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होगी।

उन्होंने कहा कि लगातार बनी हुई व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितता, वैश्विक तनाव और मौसम से जुड़े झटके भी वैश्विक आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा कर रहे हैं।

दास ने वैश्विक दक्षिण और नई भू-आर्थिक व्यवस्था को आकार देने में भारत की भूमिका के बारे में बात करते हुए कहा कि कई तरह के झटकों से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित होने के बावजूद इन अर्थव्यवस्थाओं ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि में अपना योगदान और विश्व अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका लगातार बढ़ाई है।

दास ने कहा, ‘‘दुनिया की आर्थिक ताकत पूर्व की ओर बढ़ रही है। वैश्विक दक्षिण वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति में लगातार अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। ये बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था की रूपरेखा को बदल रहे हैं और आने वाले वर्षों में हमारे व्यापार और कारोबार करने के तरीके पर स्थायी प्रभाव डालेंगे।’’

दास ने ‘अनिश्चितता से निपटना: वैश्विक दक्षिण और उभरती नई आर्थिक व्यवस्था’ विषय पर शोध संस्थान विकासशील देशों की अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस) के एक सत्र को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘यह बदलाव वैश्विक दक्षिण खासकर उन देशों के लिए, जो विकास और संरचनात्मक सुधारों के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, बड़े अवसर पैदा करता है।’’

उन्होंने वैश्विक दक्षिण के देशों के सामने आने वाली पांच चुनौतियों का जिक्र किया। ये चुनौतियां खाद्य सुरक्षा, व्यापार में विविधता लाना, ऊर्जा बदलाव, व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और रोजगार सृजन… हैं।

दास ने वैश्विक दक्षिण के देशों से ऐसी नीतियां अपनाने का आह्वान किया जो उनकी कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता, विश्वसनीयता और दक्षता को मजबूत करें। व्यापार बाधाओं और शुल्क संबंधी चुनौतियों के मौजूदा दौर में यह और भी जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में हाल के संघर्ष ने ऊर्जा झटकों के प्रति वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरी को उजागर किया है। ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर अधिक राजकोषीय दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव के रूप में इसका सबसे अधिक असर पड़ा है।

दास ने कहा, ‘‘सबक स्पष्ट है। ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने से जोखिम कम किया जा सकता है और घरेलू स्तर पर मजबूती बढ़ाई जा सकती है। नवीकरणीय ऊर्जा और जैव ईंधन ऊर्जा सुरक्षा तथा आर्थिक स्थिरता को मजबूत कर सकते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ऊर्जा सुरक्षा और बदलाव को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक दक्षिण के भीतर समन्वय, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ज्ञान का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण होगा।’’

दास ने कहा कि वृहद आर्थिक स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। वैश्विक दक्षिण के देशों के अधिकारी संघर्ष के कारण लागत बढ़ने और स्थानीय आबादी को ऊर्जा तथा जिंस कीमतों के झटकों से बचाने की जरूरत के बीच राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में संतुलन बनाने की कठिन चुनौती का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इससे खासकर उन देशों में जहां राजकोषीय घाटा अधिक है, कर्ज का स्तर बढ़ सकता है, मौद्रिक परिस्थितियां सख्त हो सकती हैं और कर्ज चुकाने की लागत बढ़ सकती है।

विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं खासकर ऊर्जा आयात करने वाले देशों में राजकोषीय घाटा 2026 में बढ़ने की आशंका है।

दास ने कहा, ‘‘इसलिए वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्थाओं को राजकोषीय और संरचनात्मक सुधार करके इस संतुलन की चुनौती से कुशलता से निपटना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि वर्तमान में दुनिया के कई हिस्सों में गरीबी, कर्ज संबंधी जोखिम, बुनियादी ढांचे की कमी, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा असुरक्षा तथा प्रौद्योगिकी तक पहुंच जैसी समस्याएं गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।

दास ने कहा कि उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अगले दशक में रिकॉर्ड 1.2 अरब युवा कामकाजी उम्र में पहुंचने वाले हैं। ऐसे में पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए निवेश बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा, खासकर तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में, जहां आमतौर पर ज्यादातर रोजगार सृजित होते हैं।

दास ने कहा कि वैश्विक दक्षिण के देशों को दुनिया भर में बढ़ते संरक्षणवादी रुख से भी निपटना होगा। सबसे समृद्ध उपभोक्ता बाजारों और प्रौद्योगिकियों तक पहुंच भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए मुश्किल होती जा रही है।

भाषा रमण अजय

अजय


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