कैमरून में डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय बैठक में सुधारों, कृषि और ई-कॉमर्स कर स्थगन पर होगी चर्चा

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कैमरून में डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय बैठक में सुधारों, कृषि और ई-कॉमर्स कर स्थगन पर होगी चर्चा

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  • Publish Date - March 8, 2026 / 07:16 PM IST,
    Updated On - March 8, 2026 / 07:16 PM IST

नयी दिल्ली, आठ मार्च (भाषा) कैमरून के याउंडे में होने वाली विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की चार दिवसीय मंत्रिस्तरीय बैठक में 166 देशों के व्यापार मंत्री डब्ल्यूटीओ सुधारों, कृषि संबंधी मामलों, विवाद निपटान और ई-कॉमर्स कर स्थगन जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।

अधिकारी ने बताया कि मत्स्य पालन सब्सिडी, चीन के नेतृत्व वाला ‘विकास के लिए निवेश सुविधा’ (आईएफडी) समझौता, ई-कॉमर्स कार्य से जुड़ा कार्यक्रम और कर स्थगन, विकास एवं एसएंडडीटी (विशेष और विभेदक व्यवहार), और समान अवसर जैसे मुद्दे भी संगठन के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान चर्चा में शामिल हो सकते हैं।

चौदहवां डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी14) 26 से 29 मार्च, 2026 तक कैमरून के याउंडे में आयोजित किया जाएगा।

मंत्रिस्तरीय सम्मेलन जिनेवा स्थित डब्ल्यूटीओ का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जिसकी बैठक हर दो साल में होती है।

अधिकारी ने बताया कि भारतीय दल का नेतृत्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल करेंगे।

यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक व्यापार पहले अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापक शुल्क और अब पश्चिम एशिया संकट के कारण बाधित हुआ है, जिससे पोत परिवहन मार्ग और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।

भारत सार्वजनिक स्टॉक होल्डिंग (पीएसएच) के मुद्दों पर स्थायी समाधान की मांग कर रहा है, जो एक दशक से अधिक समय से लंबित है। भारत ने बार-बार पीएसएच और विशेष सुरक्षा तंत्र (एसएसएम) पर निर्णय में तेजी लाने का आग्रह किया है।

एसएसएम विकासशील और अल्पविकसित देशों (एलडीसी) की पुरानी मांग है, जो उन्हें आयात में अचानक उछाल या कीमतों में गिरावट से निपटने के लिए अस्थायी रूप से शुल्क बढ़ाने की अनुमति देता है।

ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे ‘केर्न्स समूह’ के देशों का दावा है कि पीएसएच बाजार को विकृत करता है और कोई निर्यात प्रतिबंध नहीं होने चाहिए। जबकि अमेरिका अपने कृषि उत्पादों के लिए बाजार पहुंच चाहता है और यूरोपीय संघ सब्सिडी में कटौती का पक्षधर है।

अमेरिका डब्ल्यूटीओ के विवाद निपटान प्रणाली में सुधार की मांग कर रहा है। वर्तमान में इसकी अपीलीय संस्था (एबी) दिसंबर 2019 से निष्क्रिय है क्योंकि अमेरिका ने सदस्यों की नियुक्ति को रोक रखा है।

डब्ल्यूटीओ इस प्रणाली में सुधार पर चर्चा कर रहा है, जिसे संगठन का ‘क्राउन ज्वेल’ कहा जाता है। विवाद निपटान निकाय (डीएसबी) इस वैश्विक व्यापार पर नजर रखने वाले निकाय के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है।

विवादों को सुलझाने के दो मुख्य तरीके हैं, आपसी सहमति से समाधान या न्यायिक निर्णय। न्यायिक निर्णय के तहत पैनल का फैसला आता है, जिसे अपीलीय संस्था में चुनौती दी जा सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका इस द्वि-स्तरीय प्रणाली को कमजोर करना चाहता है और अपीलीय संस्था को बहाल करने का इच्छुक नहीं है। इसके विपरीत, विकासशील देश इसे तंत्र के सुचारू संचालन के लिए अनिवार्य मानते हैं।

भारत ने डिजिटल विभाजन और अवसंरचना की कमी पर चिंता जताई है, जो विकासशील देशों की ई-कॉमर्स में भागीदारी को रोकता है। भारत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होने वाली आपूर्ति पर सीमा शुल्क नहीं लगाने के स्थगन (मोरटोरियम) को लेकर भी लगातार विरोध दर्ज करा रहा है।

दिसंबर 2025 की बैठक में भारत ने स्पष्ट किया था कि वह इस स्थगन को आगे बढ़ाने का समर्थन नहीं करता है, क्योंकि यह घरेलू औद्योगीकरण की राह में बाधा है।

इस स्थगन के कारण विकासशील देशों को सालाना लगभग 10 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान होता है, जिसमें भारत का हिस्सा 50 करोड़ डॉलर से अधिक हो सकता है।

विश्व व्यापार संगठन के सदस्य 1998 से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होने वाली आपूर्ति पर सीमा शुल्क नहीं लगाने पर सहमत हुए हैं और तब से हर मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में इस कर स्थगन को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है।

भारत ने अबू धाबी में 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान चीन के नेतृत्व वाले निवेश सुविधा प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था।

चीन समर्थित 128 देशों का यह समूह आईएफडी को केवल हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों के लिए बाध्यकारी बनाने पर जोर दे रहा है। इस प्रस्ताव पर सदस्यों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं।

एसएंडडीटी प्रावधान गरीब और विकासशील देशों को समझौतों को लागू करने के लिए अधिक समय और व्यापारिक लाभ देते हैं।

विकसित देशों का कहना है कि ‘स्व-घोषणा’ के आधार पर विकासशील दर्जा हासिल करना नियमों को दरकिनार करने जैसा है, जबकि भारत जैसे देश इसे अपना अधिकार मानते हैं।

विकसित देश प्रस्तावित समझौते के तहत मत्स्य सब्सिडी को खत्म करने का दबाव बना रहे हैं।

भारत का रुख है कि जो विकसित देश गैर-विशिष्ट ईंधन सब्सिडी देते हैं, उन्हें पहले कड़े अनुशासन के दायरे में लाया जाना चाहिए।

भाषा सुमित रमण

रमण