शह मात The Big Debate | Photo Credit: IBC24
रायपुरः Religious Freedom Bill 2026 ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ अब छत्तीसगढ़ विधानसभा से पास हो चुका है। प्रदेश में धर्मांतरण रोकने के लिए लाए गए विधेयक में सजा के कड़े प्रावधानों के जरिए इस पर पूर्ण रोक का दावा है, जबकि विपक्ष कहता है ये कानून धर्मांतरण को रोक पाने में नाकाम होगा। ये तो बस बीजेपी का सियासी हथियार है। बिल पास हो चुका है। कानून बनने पर कितना सक्षम होगा, इसकी कानूनी सीमाओं और सक्षमता के साथ-साथ विपक्ष के वॉकऑउट वाले रवैये पर भी सवाल हैं।
Religious Freedom Bill 2026 छत्तीसगढ़ विधानसभा में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 पेश हुआ और बिना विपक्ष की मौजूदगी के दिनभर की चर्चा के बाद, इसे पास भी कर दिया गया। प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने विधेयक को सदन में प्रस्तुत किया। जिस पर विपक्ष ने फौरन प्रतिक्रिया दी, नेता प्रतिपक्ष डॉ चरण दास महंत ने आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि इस तरह के कानून अप्रभावी हैं। कई राज्यों में इस तरह के मामलों पर सुनवाई लंबित है। डॉ महंत ने मांग की कि इसे प्रवर समिति को भेजा जाना चाहिए। सभापति ने विपक्ष की आपत्ति खारिज कर विधेयक पेश करने की अनुमति दी जिसके विरोध में कांग्रेसी विधायकों ने सदन से दिन भर की कार्यवाही का बहिष्कार कर वॉकआउट कर दिया। नतीजा बिना विपक्ष की मौजूदगी के विधेयक पर सदन में चर्चा हुई। विपक्ष के इस रवैये पर संसदीय कार्य मंत्री ने घोर आपत्ति जताई। इसे कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति बताया।
धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने लोगों को बधाई देते हुए दावा किया कि बिल में अपेक्षित कड़े सजा प्रावधानों से धर्मांतरण निश्चित तौर पर रुकेगा, जबकि PCC चीफ दीपक बैज ने पलटवार में कहा कि धर्मांतरण बीजेपी के लिए हमेशा से एक चुनावी एजेंडा रहा है। लंबे समय से विपक्ष कहता रहा प्रदेश और देश में सरकार धर्मांतरण के लिए कड़ा कानून कब लाएगी। जब विधानसभा धर्म स्वतंत्र्य विधेयक 2026 लाया गया तो विपक्ष ने इसे पेश करने तक पर सहमति नहीं दी। चर्चा से पूरी तरह से किनारा कर लिया। विपक्ष की आशंका है कि ये धर्मांतरण का समाधान नहीं देगा। वहीं बीजेपी का दावा है ये पूरी तरह सक्षम होगा। सवाल ये है क्या वाकई ये मूल समस्या का समाधान देगा? इसे सियासी हथियार कौन बना रहा है पक्ष या विपक्ष?