रायपुर: बिना बस्तर के किसी भी पार्टी का छत्तीसगढ़ में सत्ता पाने का मिशन पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में इन दिनों पक्ष-विपक्ष के नेताओं की बस्तर में बढ़ती सक्रियता हैरान नहीं करती। कांग्रेस के छत्तीसगढ़ सह प्रभारी, PCC चीफ, मंत्री और वरिष्ठ नेता पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकें ले रहे हैं, तो दूसरी तरफ आदिवासियों के बीच अपना जनाधार मजबूत करने अगले 7 दिन भाजपा संगठन मंत्री पवन साय और बस्तर संभाग प्रभारी शिवरतन शर्मा बस्तर दौरे पर रहेंगे। बस्तर को लेकर भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती रही है कि आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर अपना स्टैंड तय करना। ऐसे में भाजपा आदिवासी वोटर्स को साधने के लिए क्या रोडमैप तय करती है? ये पार्टी के दोनों दिग्गज नेताओं के दौरे के बाद तय हो सकता है?
साल 2018 विधासभा चुनाव में भाजपा ने बस्तर पर ढीली पकड़ के चलते पूरा इलाका गंवा दिया था, लेकिन भाजपा संगठन अब 2023 विधासभा चुनाव से पहले अपनी चूक सुधारना चाहता है। इसकी कवायद शुरू हो चुकी है। भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय और बस्तर संभाग प्रभारी सीनियर विधायक शिवरतन शर्मा पांच दिवसीय बस्तर संभाग के प्रवास पर हैं। दोनों नेता 6 जुलाई को कोंडागांव में जिला कार्यकर्ताओं की बैठक लेंगे, फिर सात जुलाई को जगदलपुर,आठ जुलाई को दंतेवाड़ा में कार्यकर्ताओं की बैठक लेंगे। दरअसल,भाजपा के राष्ट्रीय सहसंगठन महामंत्री शिव प्रकाश सिलगेर मामले में देर से एक्शन में आई प्रदेश भाजपा इकाई को फटकार लगा चुके हैं। बाद में जो कमेटी बनी वो भी सिलगेर तक नहीं पहुंच पाई। अब आला नेताओँ के निर्देश के बाद प्रदेश इकाई कोई चूक नहीं चाहती है।
दूसरी तरफ 2018 चुनाव में बस्तर में कांग्रेस को भरपूर वोट और सीटें मिलीं। हाल-फिलहाल में बस्तर में कैंप के विरोध के बहाने अलग-अलग जिलों में आदिवासी ग्रामीणों का जमावड़ा और फर्जी मुठभेड़ के अलावा खदानों और बोधघाट के विरोध को थामने का प्रयास कांग्रेस और राज्य सरकार ने शुरू कर दिया है। साल 2013 के चुनाव से पहले भी कांग्रेस ने भाजपा की पड़ ढीली करने के लिए बस्तर में अलग से ओडीशा के नेता भक्त चरणदास को जिम्मेदारी सौंपी थी। वहीं, 2023 के मद्देनजर कांग्रेस ने उडीसा से ही प्रभावी नेता सप्तगिरी शंकर उल्का को प्रभारी बनाकर बस्तर में पकड़ मजबूत करने की शुरूआत कर दी है। वहीं,भाजपा नेताओँ की बस्तर में बढ़ती सक्रियता पर वरिष्ठ मंत्री रविंद्र चौबे ने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा है कि भाजपा को ढाई साल बाद बस्तर की याद आई है वो भी सिर्फ वोटों की खातिर।
दोनों दल जानते हैं प्रदेश में सत्ता का रास्ता बस्तर में जीत के बिना संभव नहीं है, इसीलिए अपने दिग्गज नताओं को बस्तर भेजकर भारतीय जनता पार्टी 2023 से पहले आदिवासी वोटर्स की साधना चाहती है। वहीं कांग्रेस पार्टी के नेता बस्तर में आदिवासियों की नाराजगी को वक्त रहते दूर कर अपने पाले में रखना चाहते हैं। बड़ा सवाल ये कि इस कवायद में कौन सा दल बस्तर में जमीनी स्तर पर आदिवासियों के ज्यादा और जल्दी करीब पहुंच पाता है?