सरगुजा: वनाधिकार पट्टा पाने लोगों ने न सिर्फ गोचर भूमि पर कब्जा कर लिया, बल्कि करीब डेढ़ लाख एकड़ से ज्यादा जमीन कब्जे की भेंट चढ़ गई है, जिसमे वनभूमि भी शामिल है। यही नहीं कब्जा करने में सिर्फ आदिवासी वर्ग ही नही बल्कि सामान्य वर्ग के लोगों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इसका खुलासा जिला स्तरीय छानबीन समिति की जांच से हो रहा है जहां 40 हजार से ज्यादा आवेदन में से सिर्फ 90 आवेदन ही पात्र पाए गए हैं।
सालों से जंगल मे रहकर जंगल की जमीन पर आश्रित रहने वाले लोगो को उनकी जमीन का अधिकार देने के मकसद से छत्तीसगढ़ में वनाधिकार पत्र बांटने शुरू किए गए, जिसके तहत सरगुजा में भी 74 हजार से ज्यादा लोगो ने आवेदन किया था। इसमेे से 48 हजार 170 आवेदन निरस्त कर दिए गए थे, इतनी बड़ी मात्रा में आवेदन कैसे निरस्त हुए ये सवाल था। जवाब मिला जिला स्तरीय जांच कमेटी की रिपोर्ट से, जिसमें हैरान करने वाला मामला सामने आया। 40 हजार 836 मामलों में 40 हजार 746 प्रकरण अपात्र पाए गए। यानी सिर्फ 90 ही, सही और पात्र लोगो ने आवेदन किया था।
जांच में समिति ने पाया कि वनाधिकार पत्र पाने आदिवासी वर्ग के लोगो को 13 दिसंबर 2005 के पहले का कब्जा प्रमाणित करना था, लेकिन हजारों आवेदनकर्ता ये प्रमाणित ही नहीं कर सके। इसके अलावा गैर आदिवासी वर्ग के लोगों ने वनाधिकार पत्र बनवाने कई एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया। यही नहीं समिति के सामने ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिसमें गांव की संरक्षित गोचर भूमि पर भी लोगों ने कब्जा करने से गुरेज नहीं किया। यही कारण है कि अब जिला प्रशासन नियमों के तहत पट्टा पट्टा बांटने के साथ ही बाकी के मामलों की सुनवाई वर्चुअल तरीक़े से कराने की बात कह रहा है।
बहरहाल ये तय है कि जिन्होंने वनाधिकार पत्र की मांग की है, उन्होंने 1 एकड़ से लेकर दर्जनों एकड़ तक की जमीन पर कब्जा किया है। ऐसे में सवाल यही है कि जमीन पर अपात्र लोगों का कब्जा है तो आखिर उनसे वसूली और उनपर कार्रवाई कब तक होती है?
Read More: व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं पं. युगल किशोर शुक्ल: प्रोफेसर संजय द्विवेदी