देश के 10 राज्यों में 14,468 झरनों की गणना, 15 प्रतिशत आबादी झरने पर निर्भर

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देश के 10 राज्यों में 14,468 झरनों की गणना, 15 प्रतिशत आबादी झरने पर निर्भर

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  • Publish Date - September 29, 2026 / 09:22 PM IST,
    Updated On - September 29, 2026 / 09:22 PM IST

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) जल शक्ति मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में पहली बार किए जा रहे झरना सर्वेक्षण के दूसरे भाग में 10 राज्यों के 14,468 झरनों की गणना की गई है। इनमें मणिपुर और महाराष्ट्र के झरनों की संख्या सबसे अधिक है।

यह रिपोर्ट 25 सितंबर को भारत मंडपम में आयोजित नौवें ‘भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह’ (आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू)-2026 के समापन समारोह में जारी की गई।

सर्वेक्षण में मणिपुर में 3,941, महाराष्ट्र में 3,652, ओडिशा में 1,957, पश्चिम बंगाल में 1,686, गोवा में 1,196, त्रिपुरा में 1,049, असम में 792, तेलंगाना में 148, आंध्र प्रदेश में 34 और राजस्थान में 13 झरनों की पहचान की गई।

‘फर्स्ट सेंसस ऑफ स्प्रिंग्स’ (खंड-दो, भाग-दो)’ नामक इस रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल को शामिल किया गया है।

रिपोर्ट में कमजोर और गंभीर स्थिति वाले झरनों की पहचान के लिए व्यवस्थित मानचित्रण करने, बुनियादी ढांचा विकास के दौरान इनका संरक्षण सुनिश्चित करने और झरना क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रमों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की जरूरत बताई गई है।

इससे पहले खंड-दो की एक रिपोर्ट, जिसमें बिहार, कर्नाटक, केरलम, लद्दाख, सिक्किम और तमिलनाडु को शामिल किया गया था, 2026 में ‘भारत जल दिवस’ पर जारी की गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में 2,629 स्थायी झरने, 909 मौसमी झरने और 114 सूख चुके झरने हैं। राज्य के कुल 3,652 झरनों में से 3,612 ग्रामीण क्षेत्रों में और 40 शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें करीब 86.5 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं, जबकि 13.5 प्रतिशत निजी स्वामित्व वाले हैं।

इसमें कहा गया है कि महाराष्ट्र में 265 यानी 7.6 प्रतिशत झरने खतरे का सामना कर रहे हैं।

मणिपुर में सर्वेक्षण किए गए 3,941 झरनों में से 3,419 बारहमासी, 457 मौसमी और 65 सूख चुके झरने हैं। इस पूर्वोत्तर राज्य में 91.4 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं। यहां के 1,336 झरने खतरे का सामना कर रहे हैं। राज्य में 3,127 झरनों का इस्तेमाल स्थानीय निवासी, 634 का इस्तेमाल गैर-निवासी और 113 का इस्तेमाल जंगली जानवर करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा में कुल 1,957 झरने हैं, जिनमें 1,568 बारहमासी, 315 मौसमी और 74 सूखे चुके झरने शामिल हैं। इनमें करीब 96 प्रतिशत झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं और 99.2 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। यहां के 295 यानी 15.7 प्रतिशत झरने खतरे में हैं।

इसी तरह, पश्चिम बंगाल में कुल 1,686 झरने हैं, जिनमें से 1,568 ग्रामीण क्षेत्रों और 118 शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें दार्जिलिंग में 1,200 और कलिम्पोंग में 427 झरने हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन जिलों के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए झरने पीने के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

गोवा के 1,196 झरनों में से 1,105 बारहमासी, 66 मौसमी और 25 सूखे चुके झरने हैं। इनमें से 662 सार्वजनिक स्वामित्व वाले और 509 निजी स्वामित्व वाले हैं। गोवा के 61 यानी 5.2 प्रतिशत झरनों पर खतरा मंडरा रहा है।

त्रिपुरा में 661 बारहमासी, 378 मौसमी और 10 सूखे चुके झरने हैं। राज्य के सभी ऐसे जलस्रोत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। सबसे अधिक 398 झरने धलाई जिले में हैं, इसके बाद उत्तर त्रिपुरा में 238 और खोवाई में 205 दर्ज किए गए।

असम में कुल 792 झरने दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 587 ग्रामीण और 205 शहरी क्षेत्रों में हैं। इनमें 662 बारहमासी, 127 मौसमी और तीन सूखे चुके झरने हैं।

तेलंगाना में 148 झरने और राजस्थान में 13 झरने दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के 13 झरनों में से 10 ग्रामीण क्षेत्रों में और तीन शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें आठ बारहमासी और पांच मौसमी झरने हैं। ये सभी 13 झरने सार्वजनिक स्वामित्व वाले हैं।

रिपोर्ट में जल सुरक्षा के लिए हिमालयी क्षेत्र में झरनों की पहचान और पुनर्जीवन से संबंधित नीति आयोग के कार्य समूह की रिपोर्ट (वर्ष 2018) का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश की करीब 15 प्रतिशत आबादी (लगभग 20 करोड़ लोग) अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से झरनों के पानी पर निर्भर है।

भाषा संतोष माधव

माधव