मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के नोटिस पर 193 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए

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मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के नोटिस पर 193 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए

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  • Publish Date - March 12, 2026 / 10:24 PM IST,
    Updated On - March 12, 2026 / 10:24 PM IST

नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के प्रस्ताव के लिए 193 विपक्षी सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।

सूत्र के अनुसार, लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। नोटिस शुक्रवार को संसद के किसी एक सदन में पेश किए जाने की संभावना है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसे किस सदन में पेश किया जाएगा।

विपक्ष के एक नेता ने बताया कि सांसदों ने नोटिस को लेकर काफी उत्साह दिखाया और आवश्यक संख्या पूरी हो जाने के बाद भी बृहस्पतिवार को कई सांसदों ने हस्ताक्षर किए।

नियमों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस पर लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं।

एक अन्य सूत्र के अनुसार, इस नोटिस पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के सभी दलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि पार्टी अब आधिकारिक रूप से इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है।

यह पहली बार है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए इस तरह का नोटिस दिया जा रहा है।

सूत्र के अनुसार, नोटिस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ सात आरोप लगाए गए हैं, जिनमें “पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण”, “चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना” और “बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करना” जैसे आरोप शामिल हैं।

विपक्षी दलों ने कई मौकों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की मदद करने का आरोप लगाया है, खासकर मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की जा रही है।

पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर खास तौर पर चिंता जताई गई है। मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग है जो उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। महाभियोग केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लगाया जा सकता है।

मुख्य निर्वावन आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसे विशेष बहुमत से पारित करने की जरूरत होती है जिसमें सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और आधार पर पद से हटाया जा सकता है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, यदि संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव की सूचना एक ही दिन दी जाती है, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत होने तक कोई समिति गठित नहीं की जाएगी।

दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से एक समिति का गठन किया जाएगा।

इस समिति में प्रधान न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के कोई न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे।

समिति की कार्यवाही किसी अदालती कार्यवाही की तरह होती है, जिसमें गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।

नियम के अनुसार, समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद, इसे सदन में पेश किया जाएगा और उसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होगी।

किसी न्यायाधीश, और इस मामले में मुख्य निर्वावन आयुक्त, को हटाने के प्रस्ताव का दोनों सदनों द्वारा पारित होना आवश्यक होगा।

जब सदन प्रस्ताव पर चर्चा करेगा, तो कुमार को सदन के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अपना बचाव करने का अधिकार होगा।

भाषा अविनाश मनीषा अविनाश रंजन

रंजन