नेपाल में बाढ़ से फंसे 31 केरलमवासी लौटे, राहत के आंसुओं के बीच सुनाई बच निकलने की कहानी

नेपाल में बाढ़ से फंसे 31 केरलमवासी लौटे, राहत के आंसुओं के बीच सुनाई बच निकलने की कहानी

नेपाल में बाढ़ से फंसे 31 केरलमवासी लौटे, राहत के आंसुओं के बीच सुनाई बच निकलने की कहानी
Modified Date: August 30, 2026 / 05:53 pm IST
Published Date: August 30, 2026 5:53 pm IST

कोच्चि, 30 अगस्त (भाषा) नेपाल में अचानक आई बाढ़ के कारण वहां फंसे केरलम के 31 पर्यटकों का एक समूह रविवार को सुरक्षित केरल लौट आया। बुद्ध मंदिर में 20 मिनट की देरी ने उनकी जान बचा ली। उनकी वापसी उनलोगों के लिए एक ऐसी अनुभूति थी, जिसपर विश्वास कर पाना कठिन था और सुरक्षित लौटने के एहसास से उनकी आंखों में आंसु आ गये।

महिलाओं, शिशुओं और बुजुर्गों सहित समूह के सदस्य यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुंचे, जहां अपने चिंतित परिजनों से दोबारा मिले, जिससे उस क्षण भावुक दृश्य देखने को मिले।

समूह के सदस्यों ने उस चमत्कारिक तरीके से बच निकलने को याद किया और बताया कि बुद्ध मंदिर में हुई देरी ने उनकी जान बचाई। उन्होंने बताया कि हादसे के बाद की भयावह रात उन्होंने सुरक्षित जगह की तलाश में पैदल चलते हुए बिताई। इस दौरान उनके पास पर्याप्त भोजन नहीं था और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का भी कोई अवसर नहीं था।

उन्होंने बताया कि यह सब उस समय हुआ, जब उन्होंने खुद अपनी आंखों के सामने करीब 600 फीट नीचे इमारतों को कुछ ही सेकंड में तेज बाढ़ की लहरों में बहते देखा।

यात्रियों ने बताया कि जब नेपाल में अचानक बाढ़ आई, तब वे काठमांडू से पोखरा जा रहे थे।

समूह के एक सदस्य ने कहा, “हमारे समूह की महिलाओं के कहने पर बुद्ध मंदिर में करीब 20-25 मिनट रुकना हमारे लिए त्रासदी से बचने में मददगार साबित हुआ।”

उन्होंने कहा, “अगर यह देरी नहीं हुई होती तो हम उस वक्त पुल और सड़क से गुजर रहे होते, जब वे पूरी तरह बह गए।”

समूह के एक अन्य सदस्य ने बताया कि जब वे काठमांडू से पोखरा जा रहे थे, तब रास्ते में पुलिस ने उन्हें रोक दिया।

उन्होंने याद करते हुए कहा, “पुलिस ने रास्ते में हमें रोक दिया। जब हमारी नजर नीचे की ओर गयी, तो करीब 600 फीट नीचे लोगों को इधर-उधर भागते हुए देखा। पानी का एक बहुत बड़ा सैलाब आया और वहां मौजूद सारी इमारतों को बहाकर ले गया। कुछ ही सेकंड में पूरा इलाका ऐसा दिखाई देने लगा, मानो वहां केवल समतल मैदान बचा हो।”

समूह में शामिल एक अन्य महिला के लिए यह भयावह अनुभव पूरी रात जारी रहा।

उन्होंने कहा, “सुरक्षित जगह तक पहुंचने के लिए हमने पूरी रात एक बेहद कठिन रास्ते से यात्रा की। हम अपनी बुनियादी जरूरतें तक पूरी नहीं कर पा रहे थे और न ही ठीक से खाना खा सके। हमें पूरी रात इसी तरह गुजारनी पड़ी।”

महिला ने कहा, “लेकिन जब बाद में हमें पता चला कि इतने लोगों की जान चली गई है, तो हमें लगा कि हमारी मुश्किलें उन लोगों के दुख और तकलीफ के सामने कुछ भी नहीं थीं, जिन्होंने हमसे कहीं अधिक सहा।’’

जब ये यात्री आखिरकार हवाई अड्डे पर अपने परिवार के सदस्यों से मिले, तो उनमें से कई लोग भावुक होकर रो पड़े। इस तरह उनकी भयावह यात्रा और मुश्किलों से भरी आपबीती का भावुक अंत हुआ।

भाषा रंजन सुरेश

सुरेश

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