वर्मा के इस्तीफ के बाद ‘महाभियोग’ की प्रक्रिया निष्प्रभावी हुई

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वर्मा के इस्तीफ के बाद ‘महाभियोग’ की प्रक्रिया निष्प्रभावी हुई

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  • Publish Date - April 10, 2026 / 05:13 PM IST,
    Updated On - April 10, 2026 / 05:13 PM IST

नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के पद से इस्तीफा देने के बाद अब लोकसभा द्वारा उन्हें पद से हटाने संबंधी प्रस्ताव पर जारी कार्यवाही स्वत: निष्प्रभावी हो गई है।

वरिष्ठ अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

संसद द्वारा पद से हटाए जाने की प्रक्रिया को रोकने के लिए भ्रष्टाचार के आरोपी न्यायाधीश के लिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प बचा था। इस प्रक्रिया को आमतौर पर ‘महाभियोग’ कहा जाता है।

बीते नौ अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे त्यागपत्र में वर्मा ने कहा, ‘‘राष्ट्रपति महोदया, मैं आपके सम्मानित कार्यालय पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता जिनके चलते मुझे यह पत्र प्रस्तुत करना पड़ रहा है, लेकिन अत्यंत पीड़ा के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र दे रहा हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।’’

पिछले साल 14 मार्च को नई दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास पर नोटों की जली हुई गड्डियां पाए जाने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था।

इस्तीफा देकर वह पेंशन के हकदार होंगे। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया से अवगत अधिकारियों ने बताया कि अगर उन्हें संसद ने हटाया होता, तो वह पेंशन और अन्य लाभों के हकदार नहीं होते, जो एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मिलते हैं।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एक बार जब उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ‘‘संभावित तिथि’’ बताए बिना इस्तीफा दे देते हैं, तो इसे तुरंत स्वीकार कर लिया जाता है और इसे स्वीकृत या अस्वीकृत करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

यदि संभावित तारीख का उल्लेख किया गया है, तो न्यायाधीश उस दिन से पहले इस्तीफा वापस ले सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ‘अपने हस्ताक्षर के साथ राष्ट्रपति को संबोधित पत्र लिखकर अपने पद से इस्तीफा दे सकता है’। किसी न्यायाधीश के इस्तीफे के लिए किसी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। एक साधारण त्यागपत्र ही पर्याप्त है।

न्यायमूर्ति वर्मा अब संवैधानिक पद पर न रहकर एक आम नागरिक की हैसियत में होंगे, इसलिए अगर सरकार सोचेगी तो वह उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू कर सकती है।

भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने नकदी विवाद में फंसे न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था।

न्यायमूर्ति खन्ना की रिपोर्ट तीन न्यायाधीशों की समिति के निष्कर्षों पर आधारित थी जिसने मामले की जांच की थी।

सूत्रों ने पहले बताया था कि न्यायमूर्ति खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था।

भाषा हक

हक वैभव

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