सार्वजनिक कर्तव्य की वजह से राज्य की श्रेणी में आती है ‘एअरफोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी’: न्यायालय

Ads

सार्वजनिक कर्तव्य की वजह से राज्य की श्रेणी में आती है ‘एअरफोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी’: न्यायालय

  •  
  • Publish Date - March 16, 2026 / 09:32 PM IST,
    Updated On - March 16, 2026 / 09:32 PM IST

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने माना है कि ‘एअरफोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी’ (एएफजीआईएस) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की श्रेणी में आती है, क्योंकि इसने सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवार की सुरक्षा एवं कल्याण की देखभाल करके सार्वजनिक कर्तव्य निभाने का काम किया है।

संविधान का अनुच्छेद 12 मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए ‘राज्य’ की श्रेणी को परिभाषित करता है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एएफजीआईएस के कर्मचारियों से संबंधित वेतन समानता विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा एक फरवरी, 2023 को अपनाए गए दृष्टिकोण को पलट दिया।

पीठ ने 12 मार्च के अपने फैसले में कहा, ‘‘हमारे विचार में, दस्तावेजों का अवलोकन अनुच्छेद 12 के अर्थ के भीतर एएफजीआईएस को ‘राज्य’ माने जाने का मामला बनता है। गहन और व्यापक नियंत्रण के पहलू के लिए, हम देखते हैं कि भारत के राष्ट्रपति ने एएफजीआईएस की स्थापना के लिए मंजूरी दी और विशेष रूप से प्रतिनियोजन नियमों को भी मंजूरी दी।’’

इसने कहा कि एएफजीआईएस के प्रधान निदेशक को हर महीने सहायक वायुसेना प्रमुख को सोसाइटी के नकदी प्रवाह के बारे में अवगत कराना होता है, जिससे इसकी गतिविधियों पर भारतीय वायुसेना के एक प्रमुख सदस्य द्वारा निगरानी सुनिश्चित होती है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘जब प्रशासनिक नियंत्रण के पहलू की जांच की जाती है, तो यह देखा जाता है कि न्यासी बोर्ड के सभी सदस्य, साथ ही प्रबंध समिति भी, भारतीय वायुसेना के सेवारत सदस्य हैं और एक निश्चित अवधि के लिए एएफजीआईएस में प्रतिनियुक्ति पर हैं।’’

इसने कहा, ‘‘अतः, संक्षेप में, निकाय का प्रशासन पूरी तरह से सरकारी कर्मचारियों के हाथों में है, भले ही निकाय स्वयं एक कथित निजी, स्वयं निहित सोसाइटी है।’’

एएफजीआईएस के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने तर्क दिया था कि 15 मार्च 2016 को लिखे एक पत्र में, एएफजीआईएस ने आधिकारिक पत्राचार में खुद का प्रतिनिधित्व ‘सरकारी’ होने के रूप में किया था।

उन्होंने कहा कि एएफजीआईएस के दिन-प्रतिदिन के मामलों का प्रबंधन भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किया जाता है, और जिस भूमि पर कार्यालय स्थित है वह रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई है, और इसे लगाए गए विभिन्न करों से छूट भी प्राप्त है।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हमारा मानना ​​है कि एएफजीआईएस वास्तव में एक सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करती है। सशस्त्र बलों के कर्मियों की सुरक्षा और कल्याण एक प्रमुख सरकारी कार्य है। सशस्त्र बलों की भूमिका सीधे तौर पर राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ी हुई है, और इसकी रक्षा करने के लिए, बलों के सदस्यों को सख्त नियमों, निर्विवाद आचरण का पालन करना और बनाए रखना आवश्यक है, और कभी-कभी, सबसे गंभीर एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी।’’

इसने कहा कि उनकी सुरक्षा में राज्य की भूमिका सेवा से उनकी सेवानिवृत्ति पर समाप्त नहीं होती, क्योंकि बलों के किसी व्यक्ति का जीवन हमेशा सेवा में उनके समय से आकार लेता है।

फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि एक बिंदु पर एएफजीआईएस ने सेवा कर से छूट का दावा करते हुए खुद के सरकारी होने का दावा किया, क्योंकि यह रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘असल में, अपीलकर्ताओं (कर्मचारियों) की चुनौती का विरोध करके, एएफजीआईएस अपने ही बयान से पलट गई है। हम यह समझने में विफल हैं कि एक संगठन एक उद्देश्य के लिए ‘सरकारी’ हो सकता है लेकिन दूसरे उद्देश्य के लिए (ऐसा) नहीं (भी) हो सकता है।’’

शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष छठे वेतन आयोग की मांग करने वाले कर्मचारियों की याचिका को बहाल करते हुए कहा कि यह सुनवाई योग्य है, क्योंकि एएफजीआईएस संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की श्रेणी में है।

पीठ ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीघ्रता से निर्णय लेने का अनुरोध किया जाता है कि यह मामला वर्ष 2017 में दायर किया गया था। अपील स्वीकार की जाती है।’’

भाषा नेत्रपाल सुरेश

सुरेश