चेतावनी प्रणालियों में वर्षा के अलावा अन्य कारणों से होने वाली आपदाओं के लिए अलर्ट जरूरी: वैज्ञानिक

चेतावनी प्रणालियों में वर्षा के अलावा अन्य कारणों से होने वाली आपदाओं के लिए अलर्ट जरूरी: वैज्ञानिक

चेतावनी प्रणालियों में वर्षा के अलावा अन्य कारणों से होने वाली आपदाओं के लिए अलर्ट जरूरी: वैज्ञानिक
Modified Date: September 20, 2026 / 04:16 pm IST
Published Date: September 20, 2026 4:16 pm IST

(कृष्णा)

नयी दिल्ली, 20 सितंबर (भाषा) जलवायु वैज्ञानिक टापियो श्नाइडर ने कहा है कि शुरुआती चेतावनी प्रणालियों का दायरा केवल बारिश की घटनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें नेपाल में अचानक आई बाढ़ जैसी आपदाओं की वजहों को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि कुछ मिनट पहले भी चेतावनी निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की जान बचा सकती है।

अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कैलटेक) में पर्यावरण विज्ञान और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर श्नाइडर छात्रों को संबोधित करने और एक परिचर्चा में हिस्सा लेने के लिए अशोक विश्वविद्यालय पहुंचे थे।

नेपाल में 26 अगस्त को ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के खिसकने के बाद आई भीषण बाढ़ के कारण मलबा तिब्बत से बहकर मध्य नेपाल तक पहुंचा, जिससे 1,200 से अधिक लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग अब भी लापता हैं।

श्नाइडर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘शुरुआती चेतावनी प्रणालियां महत्वपूर्ण हैं। हमें शायद इनका दायरा बारिश के कारण होने वाली घटनाओं से आगे बढ़ाकर ऐसी घटनाओं तक भी करना चाहिए, ताकि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को कम से कम कुछ मिनट पहले चेतावनी मिल सके और इस तरह कुछ लोगों की जान बचाई जा सके।’’

उन्होंने कहा कि जलवायु गर्म होने के साथ बर्फ पिघल रही है और ऐसी घटनाएं और बढ़ने की आशंका है ‘‘हालांकि हर घटना के तात्कालिक कारण अलग-अलग होंगे।’’

जलवायु वैज्ञानिक ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है और यह ‘‘अपरिहार्य’’ है कि दुनिया को 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि वाले एक दशक का सामना करना पड़ेगा।

श्नाइडर ‘क्लाइमेट मॉडलिंग अलायंस’ का भी नेतृत्व करते हैं। यह कैलटेक, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों तथा अप्लाइड गणितज्ञों का गठबंधन है, जो पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक नया मॉडल विकसित कर रहा है।

उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों की टीम ‘‘आधुनिक कंप्यूटिंग आर्किटेक्चर का अधिकतम उपयोग करने और उपलब्ध आंकड़ों का ज्यादा व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने’’ की दिशा में काम कर रही है।

श्नाइडर ने कहा कि वायु गुणवत्ता में सुधार के प्रयास तेज होने के बावजूद भारत में वैश्विक तापमान वृद्धि के प्रभाव और अधिक देखने को मिल सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत में पहले ही अत्यधिक गर्म दिनों और अत्यधिक बारिश की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।

भारत में बारिश का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होने के मुद्दे पर उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मॉडल विकसित किए जा सकते हैं, जिन्हें अन्य बड़े पैमाने के मॉडल की तुलना में चलाना काफी सस्ता हो। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के समूह ऐसे मॉडल विकसित कर सकते हैं और उन्हें भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के साथ इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

भाषा आशीष सुरेश

सुरेश


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