सीईसी के खिलाफ आरोप बहस के लिए प्रासंगिक, लेकिन हटाने के मानदंडों को पूरा नहीं करते : राधाकृष्णन

सीईसी के खिलाफ आरोप बहस के लिए प्रासंगिक, लेकिन हटाने के मानदंडों को पूरा नहीं करते : राधाकृष्णन

सीईसी के खिलाफ आरोप बहस के लिए प्रासंगिक, लेकिन हटाने के मानदंडों को पूरा नहीं करते : राधाकृष्णन
Modified Date: April 7, 2026 / 07:47 pm IST
Published Date: April 7, 2026 7:47 pm IST

नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने विपक्ष द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए लाए गए प्रस्ताव को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा कि आरोप राजनीतिक बहस के लिए प्रासंगिक हैं, लेकिन प्रथम दृष्टया वे बर्खास्तगी की कार्यवाही के लिए आवश्यक उच्च संवैधानिक मानदंडों को पूरा नहीं करते।

राधाकृष्णन ने अपने आदेश में कहा कि उन्हें लगता है कि आरोपों में ऐसे कदाचार साबित करने वाले आवश्यक सबूतों का अभाव है, जिससे मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का प्रथम दृष्टया मामला बनता हो।

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ आरोप उन मामलों से संबंधित हैं जिन पर पहले ही निर्णय हो चुका है या जो वर्तमान में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। हालांकि ये आरोप राजनीतिक बहस के लिए प्रासंगिक हैं, लेकिन प्रथम दृष्टया वे बर्खास्तगी की कार्यवाही के लिए आवश्यक उच्च संवैधानिक मानदंडों को पूरा नहीं करते।’’

राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कुमार को उनके पद से हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव को सोमवार को खारिज कर दिए।

विपक्ष ने मार्च में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को नोटिस सौंपकर सात आरोप लगाए थे, जिनमें पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना और बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करना शामिल थे।

लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने अलग-अलग आदेशों में संविधान के अनुच्छेद 324(5) और अन्य प्रासंगिक संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों के तहत पेश नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

विपक्षी सदस्यों द्वारा पेश नोटिस को खारिज करते हुए अपने आदेश में राधाकृष्णन ने कहा कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए प्रथम दृष्टया आवश्यक शर्तें पूरी नहीं हुई हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘इस पृष्ठभूमि में, प्रस्ताव और मौजूदा संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों पर विचार करने के बाद, मेरा दृढ़ मत है कि प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। तदनुसार, मैं प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार करता हूं।’’

सभापति ने अपने आदेश में कुमार के विरुद्ध विपक्ष के आरोपों का बिंदुवार खंडन किया।

राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘पहले आरोप में कहा गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में श्री ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति में गड़बड़ी हुई है और यह दागदार है, क्योंकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत उनकी नियुक्ति के लिए निर्धारित चयन प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को पहले ही चुनौती दी गई है और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।’’

उन्होंने कहा कि ये आरोप तथ्यात्मक रूप से सही मान भी लिए जाएं, तो भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के किसी भी कदाचार के दायरे में नहीं आते।

चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालने के आरोप को नकारते हुए सभापति ने कहा कि यह स्पष्ट है कि चुनावी आंकड़ों के खुलासे से संबंधित मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय द्वारा विचार किया गया था, और निर्वाचन आयोग ने उसमें जारी निर्देशों का विधिवत अनुपालन किया था।

बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित विपक्ष के आरोप पर राधाकृष्णन ने कहा कि वर्तमान में न्यायिक विचाराधीन मुद्दों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कदाचार के साक्ष्य के रूप में उनकी बर्खास्तगी की कार्यवाही के लिए इस्तेमाल करना पूरी तरह से अनुचित होगा।

यह पहला मौका था जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर नोटिस पेश किया गया था।

नोटिस पर हस्ताक्षर करने वालों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, राजद, और वामपंथी दल शामिल थे, जो विपक्षी गठबंधन ‘‘इंडिया’’ का हिस्सा हैं। इनके अलावा आम आदमी पार्टी (आप) भी नोटिस पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल है, जो अब औपचारिक रूप से विपक्षी गठबंधन में नहीं है। कुछ निर्दलीय सांसदों ने भी नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे।

भाषा अविनाश वैभव

वैभव


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