मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का आरोप, मंत्री ने जांच के आदेश दिए

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मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का आरोप, मंत्री ने जांच के आदेश दिए

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  • Publish Date - September 19, 2026 / 07:43 PM IST,
    Updated On - September 19, 2026 / 07:43 PM IST

देहरादून, 19 सितंबर (भाषा) उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने से जुड़े फर्जी प्रमाण-पत्रों के इस्तेमाल के आरोपों के बाद प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने देहरादून के जिलाधिकारी को जांच करने और एक सप्ताह के अंदर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं ।

इस मुद्दे को सामने लाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने शुक्रवार को राज्य के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा मंत्री उनियाल से मुलाकात की और लगभग 350 अभ्यर्थियों की एक सूची सौंपते हुए उनके प्रमाणपत्रों की विस्तृत जांच की मांग की ।

बहुगुणा ने साफ किया कि वह सूची में शामिल सभी अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी होने का दावा नहीं कर रहे हैं लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड और दाखिले से जुड़ी जानकारियों पर संदेह होने के चलते उनके दस्तावेजों की जांच की मांग कर रहे हैं।

उनियाल ने कहा कि सरकार ने देहरादून के जिलाधिकारी को जांच करने और एक हफ़्ते के अंदर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।

बहुगुणा ने बताया कि 350 अभ्यर्थियों में से अनेक ने अपनी हाई स्कूल और 12वीं की पढ़ाई उत्तराखंड के बाहर की है जबकि कुछ ने बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में सम्मिलित हुए।

हालांकि, किसी दूसरे राज्य में पढ़ाई करने या अन्य राज्य में नीट में शामिल होने से ही यह साबित नहीं हो जाता कि प्रमाणपत्र नकली हैं।

बहुगुणा के अनुसार, यह मामला ‘स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित’ श्रेणी के तहत आवेदन करने वाले कुछ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच के दौरान सामने आया।

उन्होंने बताया कि संबंधित अभ्यर्थियों और उनके प्रमाणपत्र नंबरों की सूची वेबसाइट पर उपलब्ध थी।

उन्होंने कहा कि ऑनलाइन रिकॉर्ड के साथ सत्यापन के दौरान कुछ प्रमाणपत्रों के नंबर पोर्टल पर नहीं मिले, जबकि एक मामले में दर्ज प्रमाणपत्र या आवेदन संख्या किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ी पायी गयी ।

उन्होंने दावा किया कि एक मामले में ऑनलाइन आवेदन की स्थिति ‘पेंडिंग’ दिख रही थी, जबकि उस अभ्यर्थी को पहले ही मेडिकल सीट आवंटित की जा चुकी थी। हालांकि, इन दवों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

देहरादून प्रशासन ने 17 सितंबर को कई कॉमन सर्विस सेंटर्स (सीएससी) का औचक निरीक्षण किया। जिलाधिकारी आशीष चौहान के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए, अधिकारियों ने अनियमितताएं पाए जाने के बाद चार सीएससी केंद्रों को सील कर दिया और कुछ कंप्यूटर व लैपटॉप जब्त कर लिए।

देहरादून में सीएससी ऑपरेटर रोहित नेगी ने ‘पीटीआई भाषा’ को बताया कि सीएससी की भूमिका आम तौर पर ऑनलाइन आवेदन भरने और पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने तक ही सीमित होती है।

उन्होंने बताया कि इसके बाद, आवेदन सरकारी तंत्र से होकर गुजरता है। उन्होंने स्थायी निवास प्रमाणपत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि इन आवेदनों के मामलों में, तहसील, राजस्व अधिकारियों या पटवारी के स्तर पर जांच के बाद सक्षम अधिकारी की मंज़ूरी से दस्तावेज़ जारी किया जाता है।

स्वास्थ्य मंत्री उनियाल ने कहा कि जांच में न सिर्फ प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की भूमिका देखी जाएगी, बल्कि यह भी पता लगाया जाएगा कि उसे जारी करने की प्रक्रिया के किस चरण में गड़बड़ी हुई। उनियाल ने इस मामले के पीछे किसी बड़े गिरोह के होने की संभावना की ओर भी इशारा किया ।

उनियाल ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार जाली प्रमाणपत्र के आधार पर दाखिला लेता है और बाद में धोखाधड़ी साबित हो जाती है, तो दाखिला रद्द करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है ।

भाषा ध्रुव दीप्ति

अमित संतोष

संतोष