असम के कार्बी आंगलोंग में मिलीं प्राचीन मूर्तियां और शिलालेख, इतिहास के नये पन्ने खुले
असम के कार्बी आंगलोंग में मिलीं प्राचीन मूर्तियां और शिलालेख, इतिहास के नये पन्ने खुले
(त्रिदीप लहकर)
दीफू (असम), 19 जुलाई (भाषा) असम के कार्बी आंगलोंग जिले में इतिहास का एक अनमोल खजाना सामने आया है। हाल में यहां खुदाई के दौरान पत्थर की प्राचीन दुर्लभ मूर्तियां और शिलालेख मिले हैं, जो राज्य की समृद्ध पुरातात्विक विरासत के साथ-साथ उसके अतीत के कई अनछुए अध्याय पर नयी रोशनी डालती हैं।
ये दुर्लभ वस्तुएं मध्य असम के इस जिले के फुलोनी क्षेत्र में स्थित सार्थे रोंगफार गांव में मिली हैं जो अतीत की विरासत को सामने लाने में इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाता है।
दो सौ वर्ष पुराने दो तालाबों के आसपास पुरातत्वविदों और स्थानीय ग्रामीणों द्वारा की गई खुदाई में अनेक दुर्लभ कलाकृतियां मिली हैं। इनमें बारीक नक्काशी वाली नृत्य की मुद्रा वाली आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, शिवलिंग, प्राचीन मंदिरों के अवशेष तथा एक विशाल चट्टान पर उकेरी गई भगवान गणेश की आकर्षक आकृति शामिल हैं।
कार्बी आंगलोंग के उपायुक्त अरण्यक सैकिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हाल में सार्थे रोंगफार गांव के दौरे के दौरान मुझे असम की पुरातात्विक विरासत के एक ऐसे अद्भुत, लेकिन कम चर्चित अध्याय को देखने का अवसर मिला। गांव के दो प्राचीन तालाबों के आसपास की खुदाई में पत्थर की मूर्तियों और शिलालेखों का प्रभावशाली संग्रह सामने आया है।’’
उन्होंने बताया कि विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से अधिकांश वस्तुएं 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की हैं। हालांकि, स्थानीय परंपराएं इन्हें महाभारत काल और पौराणिक अश्वमेध यज्ञ से जोड़ती हैं।
सैकिया ने कहा, ‘‘स्थानीय लोग इन्हें महाभारत काल का मानते हैं, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से इनके अहोम शासनकाल के समय के होने की संभावना है। हालांकि, इस संबंध में स्पष्ट ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं।’’
उन्होंने बताया कि सबसे दिलचस्प बात ग्रामीणों का यह दावा है कि इन दोनों तालाबों का जलस्तर मौसम बदलने के बावजूद कभी नहीं घटता-बढ़ता और पूरे वर्ष लगभग एक समान बना रहता है।
सैकिया ने कहा, ‘‘इनमें से कई अमूल्य पुरावस्तुओं को होजाई पुरातत्व संग्रहालय और दीफू स्थित जिला संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।’’
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अधिकांश अवशेष जर्जर अवस्था में मिले हैं। हालांकि, अब जिला प्रशासन ने इनके संरक्षण और सुरक्षित रखरखाव के लिए आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
सैकिया ने कहा, ‘‘गांव के अलग-अलग हिस्सों में आज भी अनेक पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। हमने देखा है कि इनमें से कुछ प्राचीन अवशेषों का इस्तेमाल स्थानीय लोग अब रोजमर्रा के घरेलू कार्यों में भी करने लगे हैं।’’
उन्होंने कहा कि ये खोज कोई अकेली घटना नहीं हैं। फुलोनी-डोकमोका-हावराघाट का पूरा इलाका ऐसे अनेक पुरातात्विक स्थलों से समृद्ध है, जो कछारी और दबोक राजवंशों के शासनकाल के दौरान इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करते हैं।
विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने इन पुरातात्विक स्थलों का व्यापक दस्तावेजीकरण, वैज्ञानिक संरक्षण और इनके प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ाने की मांग की है, ताकि असम के इतिहास का यह अनमोल अध्याय आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
सैकिया ने कहा, ‘‘इन पहाड़ियों और गांवों की मिट्टी के नीचे इतिहास की अनगिनत कहानियां, परंपराएं और ऐसे अवशेष छिपे हैं, जिन पर अब तक बहुत कम ध्यान दिया गया है।’’
पिछले माह कार्बी आंगलोंग जिला प्रशासन ने कहा था कि वह ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ताई स्टडीज एंड रिसर्च’ (आईटीएसएआर) के विशेषज्ञों से संपर्क करने पर विचार कर रहा है, ताकि यहां सुरक्षित रखी गई दो दुर्लभ ताई पांडुलिपियों का रहस्य समझा जा सके। साथ ही, इस धरोहर को केंद्र सरकार की ‘ज्ञान भारतम्’ योजना में शामिल कराने की भी तैयारी की जा रही है।
भाषा
खारी सुभाष
सुभाष

Facebook


