खनन के कारण अरावली पर्वतमाला अस्तित्व के संकट का सामना कर रही: पर्यावरणविद

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खनन के कारण अरावली पर्वतमाला अस्तित्व के संकट का सामना कर रही: पर्यावरणविद

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  • Publish Date - June 18, 2026 / 12:56 AM IST,
    Updated On - June 18, 2026 / 12:56 AM IST

नयी दिल्ली, 17 जून (भाषा) पर्यावरणविदों, पारिस्थितिकीविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने बुधवार को कहा कि 700 किलोमीटर के दायरे में फैली अरावली पर्वतमाला अवैध खनन तथा अवसंरचना परियोजनाओं के कारण अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है।

पर्यावरणविदों, पारिस्थितिकीविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक बयान में कहा कि अरावली पर्वतमाला का नष्ट होना मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। उन्होंने कहा कि इसका कारण यह है कि यह पर्वतमाला उत्तरी मरुस्थलीकरण के विरुद्ध एक प्राकृतिक अवरोधक है और यह जैव विविधता तथा जल पुनर्भरण का बचाव करता है।

‘अरावली विरासत जन अभियान’ समूह ने ‘विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस’ पर यह बयान जारी किया, जिसे हर वर्ष 17 जून को मनाया जाता है।

समूह की सह-संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने कहा, ‘‘विशेषज्ञ मरुस्थलीकरण को सीधे खनन के कारण अरावली पर्वतमाला के बड़े पैमाने पर विनाश से जोड़ते हैं।’’

अहलूवालिया ने बताया कि खनन से वनस्पति की हानि और बढ़ सकती है, जिससे मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ जाता है, ‘‘जो आगे चलकर उत्तर-पश्चिम भारत की खाद्य और जल सुरक्षा को खतरे में डालता है।’’

उन्होंने कहा कि 2018 में उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति के निष्कर्षों के अनुसार, खनन के कारण राजस्थान के अलवर जिले में अरावली की 31 पहाड़ियां पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा ने कहा कि खनन गतिविधियों के कारण अरावली क्षेत्र में भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है, जिससे पीने और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ा है।

समूह का यह बयान उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को एक खुला पत्र लिखे जाने के एक दिन बाद आया जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति को लेकर चिंता जताई गई थी, जो अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सीमा तय करने से संबंधित केंद्र की रिपोर्ट की समीक्षा करेगी।

पत्र में कहा गया था कि नयी समिति न तो ‘‘उच्चाधिकार प्राप्त’’ है और न ही ‘‘निष्पक्ष’’।

भाषा

देवेंद्र सुरभि

सुरभि