असम बाढ़: शिवसागर के लोगों ने बयां की भयावह कहानी, 12 घंटे दीवान पर बैठकर बुजुर्गों की बची जान

असम बाढ़: शिवसागर के लोगों ने बयां की भयावह कहानी, 12 घंटे दीवान पर बैठकर बुजुर्गों की बची जान

असम बाढ़: शिवसागर के लोगों ने बयां की भयावह कहानी, 12 घंटे दीवान पर बैठकर बुजुर्गों की बची जान
Modified Date: July 28, 2026 / 05:44 pm IST
Published Date: July 28, 2026 5:44 pm IST

(सुष्मिता गोस्वामी)

शिवसागर, 28 जुलाई (भाषा) असम के शिवसागर जिले में बाढ़ के दौरान 70 वर्ष से अधिक उम्र के दंपति मुकुल और बोंटी बेजबरुआ को अपने घर में घुसे बाढ़ के पानी के बीच करीब 12 घंटे तक एक लकड़ी के दीवान पर बैठकर जान बचानी पड़ी। वे बाढ़ से तो बच गए, लेकिन उनका सबकुछ बर्बाद हो गया।

मोबाइल फोन की बैटरी खत्म होने के कारण उनका बाहरी दुनिया से संपर्क भी टूट गया। 10 दिन पहले नाजिरा कस्बे से प्रशासन ने नाव की मदद से उन्हें बचाया। सेवानिवृत्त प्रोफेसर मुकुल बेजबरुआ और उनकी पत्नी के पास अब केवल बदन पर पहने कपड़े ही बचे हैं। उनका घर कीचड़ और मलबे से भर गया है तथा उनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।

शिवसागर की ओएनजीसी कॉलोनी में रहने वाली मधुस्मिता बोरठाकुर का अनुभव भी कम डरावना नहीं था। वह और उनकी दो बेटियां कॉलोनी में बहुत तेजी से पानी भर जाने के कारण बाढ़ में फंसते-फंसते बचीं।

उनके पति फील्ड ड्यूटी पर बाहर गए हुए थे। ऐसे में वह अपनी दोनों बेटियों के साथ एक खुली वैन में बैठकर वहां से निकलने में सफल रहीं और अगले कुछ दिन अपनी एक मित्र के घर बिताए।

असम में एक सप्ताह से अधिक समय पहले आई इस बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही शिवसागर जिले में मचाई। इस साल राज्य में बाढ़ से मरने वालों की संख्या 68 हो गई और छह लाख से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हुए।

बेजबरुआ दंपति ने 19 जुलाई की रात भयावह मंजर का मुश्किल से सामना किया।

मुकुल बेजबरुआ ने कहा, ‘‘रात करीब आठ बजे तेजी से बहते पानी की आवाज सुनाई दी। बाहर अफरा-तफरी मची हुई थी। मैं और मेरी पत्नी लकड़ी के एक पुराने दीवान पर चढ़ गए, जिसमें पुराने रजाई-कंबल रखे थे। अंदर रखा सामान पूरी तरह भीग गया था, लेकिन दीवान पानी में तैर रहा था और हम उसी पर बैठे रहे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पानी का बहाव इतना तेज था कि फ्रिज और अलमारी तक गिर गईं। कुछ भी नहीं बचा। हमने किसी तरह अपनी जान बचाई।”

बीस जुलाई की सुबह प्रशासन ने नाव की मदद से उन्हें बचाया। जब बाढ़ का पानी कम हुआ तो वे घर लौटे, लेकिन देखा कि उनका लगभग पूरा सामान नष्ट हो चुका था।

उनके घर से दो ट्रक कीचड़ और मलबा निकाला गया। इसके बाद भी घर में दो से तीन इंच तक गाद जमी हुई थी।

गड़गांव कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर मुकुल बेजबरुआ ने बताया कि वह 1992 से नाजिरा में रह रहे हैं, लेकिन उन्होंने वहां कभी इतनी भयानक बाढ़ नहीं देखी और न ही इसके बारे में सुना था।

उन्होंने कहा, ‘‘पहले भारी बारिश के बाद पानी भर जाता था, लेकिन ऐसी बाढ़ की कभी कल्पना भी नहीं की थी।’’

अपने नुकसान पर दुख जताते हुए उन्होंने बाढ़ से प्रभावित अन्य लोगों की भी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पास किसी तरह जीवन दोबारा शुरू करने के कुछ साधन हैं। मेरा बेटा भी आ गया है। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना रोजगार तक खो दिया है और अब भी बाढ़ की मार झेल रहे हैं।’’

उन्होंने प्रभावित लोगों के जल्द पुनर्वास की मांग की।

ओएनजीसी कॉलोनी में मधुस्मिता बोरठाकुर ने भी ऐसा ही मुश्किल समय देखा, जैसा पहले कभी नहीं देखा था। पानी का बहाव बढ़ता गया, वह अपनी नौ साल और तीन साल की दो बेटियों के साथ घर में फंसी रहीं।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पति फील्ड ड्यूटी पर थे और एक सप्ताह बाद लौटने वाले थे। हम फिलहाल सुरक्षित थे, लेकिन पानी बहुत तेजी से बढ़ रहा था। किसी भी आपात स्थिति में मेरी मदद करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मैं बहुत डर गई थी।’’

आखिरकार उन्होंने अपनी दोनों बेटियों के साथ एक खुली वैन में जगह बनाई और वहां से निकलकर अपनी एक मित्र के घर चली गईं। संयोग से वह इलाका बाढ़ से बच गया।

हालांकि, बाढ़ का पानी अब उतर रहा है, लेकिन प्रभावित लोगों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। उनके लिए आपदा का पहला दौर भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन अब घरों से मलबा हटाना, उन्हें फिर से बसाना और इस दर्दनाक अनुभव से उबरना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

भाषा जोहेब नेत्रपाल

नेत्रपाल


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