बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र: दिल्ली उच्च न्यायालय
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र: दिल्ली उच्च न्यायालय
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने पर रोक लगाना या उसे नियंत्रित करना केंद्र के नीति-निर्माण के दायरे में आता है और अधिकारियों को इस पहलू पर निर्णय लेना चाहिए।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी. अरोड़ा की पीठ ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार कर दिया और केंद्र सरकार से इसपर अभ्यावेदन के तौर पर विचार करने को कहा।
पीठ ने हालांकि, अधिकारियों के प्रक्रिया पूरी करने के लिए कोई समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, “आपके विचारों पर प्रतिवादी विचार करेंगे। हितधारकों से परामर्श किया जाना है।”
पीठ ने कहा, “उनके विचार लिए जाने हैं और फिर यह नीति के दायरे में आता है। अदालत के लिए यह निर्देश देना उचित नहीं है कि आपको इसे प्रतिबंधित करना चाहिए या उसे प्रतिबंधित करना चाहिए। उन्हें इस पर विचार करने दीजिए और फिर आदेश पारित करने दीजिए।”
याचिकाकर्ता ने केंद्र को 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल को “सीमित” करने के लिए कानून या दिशानिर्देश बनाने पर विचार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
याचिका में 13 से 16 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया सामग्री को “विनियमित” करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने का भी अनुरोध किया गया था।
केंद्र सरकार की वकील निधि रमन ने कहा कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित या विनियमित करने का मुद्दा नीतिगत विषय है, जिस पर केंद्र को विचार करना होगा क्योंकि इसके लिए नया कानून बनाने की आवश्यकता हो सकती है।
उन्होंने कहा कि ऐसी नीति के व्यापक प्रभाव होंगे और इसके लिए हितधारकों से परामर्श करना आवश्यक होगा।
केंद्र के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता की याचिका को अधिकारी एक प्रतिवेदन के तौर पर देख सकते हैं और इस पर उचित आदेश जारी किया जा सकता है।
अदालत द्वारा इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के पिछले आदेश के बाद कोई कार्रवाई किए जाने के बारे में पूछे जाने पर वकील ने कहा कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम बनाया जा चुका है, जो ऑनलाइन मंच पर बच्चों की निजता की भी सुरक्षा करता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने सोशल मीडिया मंचों पर बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई और अदालत से सरकार को प्रतिवेदन पर समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने का निर्देश देने का आग्रह किया।
पीठ ने कहा, “हम उन्हें बाध्य नहीं करना चाहते। ये सभी नीतिगत मामले हैं।”
अदालत ने कहा कि “प्रतिबंध” “अंतिम राहत” है और इस बीच मध्यस्थों द्वारा सीएसएएम के खिलाफ कदम उठाए जा रहे हैं।
मेटा मंच के वरिष्ठ वकील ने आश्वासन दिया कि कंपनी अपने मंचों पर सीएसएएम को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा रही है।
उन्होंने बताया कि पिछले साल फेसबुक पर सीएसएएम वाली छह लाख से अधिक पोस्ट हटाई गईं और इंस्टाग्राम से भी ऐसी दो लाख से अधिक पोस्ट हटाई गईं।
वरिष्ठ वकील ने कहा कि दोनों मंचों पर सीएसएएम की “सक्रिय पहचान दर” 99 प्रतिशत थी।
उन्होंने कहा, “हटाए गए खातों की संख्या बहुत अधिक है। साथ ही, आप कुछ विकृत मानसिकता वाले शरारती तत्वों को ऐसा करने से नहीं रोक सकते। तकनीक विकसित हो रही है और पहचान करना आसान हो रहा है… लेकिन होता यह है कि हमारे तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ सामग्री लीक हो जाती है और मीडिया में आ जाती है।”
भाषा राखी प्रशांत
प्रशांत

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