कोलकाता, 20 जुलाई (भाषा) पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वर्ष 1993 में एक रैली पर पुलिस गोलीबारी की जांच से संबंधित आयोग की रिपोर्ट सोमवार को विधानसभा में पेश करते हुए पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर इस घटना का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया।
मुख्यमंत्री ने तृणमूल कांग्रेस की 21 जुलाई की वार्षिक रैली से एक दिन पहले न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग की रिपोर्ट सदन में रखी। यह रैली तीन दशक पहले हुई इस घटना में मारे गए लोगों की स्मृति में आयोजित की जाती है।
शुभेंदु ने कहा कि राज्य सरकार को वर्ष 2024 में रिपोर्ट मिलने के बावजूद तत्कालीन तृणमूल सरकार ने आयोग की कई महत्वपूर्ण सिफारिशों पर अमल नहीं किया।
उन्होंने कहा, ‘‘आयोग ने प्रत्येक मृतक के परिजन को 25 लाख रुपये और प्रत्येक घायल को पांच लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की थी। लेकिन पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार ने न तो इन सिफारिशों को लागू किया और न ही मुआवजा दिया।’’
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस ने कई वर्षों तक इस घटना का राजनीतिक लाभ उठाया, लेकिन पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
बंगाल में 21 जुलाई के ‘शहीद दिवस’ की शुरुआत 21 जुलाई, 1993 की उस घटना से जुड़ी है, जब वाम मोर्चा शासन के दौरान ममता बनर्जी के नेतृत्व में एस्प्लेनेड में निकाली गई रैली पर पुलिस की गोलीबारी में युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। कांग्रेस ने इन कार्यकर्ताओं की स्मृति में इस दिन को ‘शहीद दिवस’ घोषित किया था।
बाद में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1990 के दशक के उत्तरार्ध में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। इसके बाद उनकी पार्टी ने धीरे-धीरे इस वार्षिक आयोजन की जिम्मेदारी संभाल ली और प्रत्येक वर्ष धर्मतला में विशाल रैली आयोजित करने लगी।
शुभेंदु ने विधानसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘21 जुलाई की घटना का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। कई लोगों ने इसी के आधार पर अपना राजनीतिक और व्यक्तिगत भविष्य बनाया।’’
जांच आयोग के निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आयोग ने पाया है कि युवा कांग्रेस की रैली पर पुलिस गोलीबारी की कोई ऐसी स्थिति नहीं थी, जो आवश्यक बनती हो। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किन परिस्थितियों में बल प्रयोग किया गया।
मुख्यमंत्री ने आयोग के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों का भी उल्लेख करते हुए दावा किया कि पूर्व नेता प्रतिपक्ष पंकज बनर्जी (जिनका नाम गवाह के रूप में दर्ज था) आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्ता इस घटना के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार थे।
उन्होंने कहा, ‘‘गुप्ता बाद में तृणमूल सरकार में बिजली मंत्री बने। और स्वयं को इस घटना की सबसे बड़ी गवाह बताने वालीं ममता बनर्जी को आयोग ने कभी बुलाया ही नहीं।’’
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग का गठन वर्ष 2011 में ममता बनर्जी सरकार ने 21 जुलाई, 1993 को तत्कालीन राज्य सचिवालय ‘राइटर्स बिल्डिंग’ की ओर मार्च कर रहे युवा कांग्रेस के समर्थकों पर पुलिस गोलीबारी की जांच के लिए किया था।
तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ रैली का नेतृत्व कर रहीं ममता बनर्जी भी पुलिस कार्रवाई में घायल हुई थीं। आयोग ने वर्ष 2024 में राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपने से पहले 300 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए।
आयोग की सिफारिशों में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के दौरान सेवा दे चुके भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के कई अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का सुझाव भी शामिल था।
तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में यह रिपोर्ट विधानसभा में पेश नहीं की गई और न ही इसकी सिफारिशों को लागू करने के संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा की गई।
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