बिरला ने ‘एनसीपीआई सांसदों’ को जवाब के लिए 22 सितंबर तक का समय दिया

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बिरला ने ‘एनसीपीआई सांसदों’ को जवाब के लिए 22 सितंबर तक का समय दिया

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  • Publish Date - September 3, 2026 / 06:45 PM IST,
    Updated On - September 3, 2026 / 06:45 PM IST

नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने की मांग को लेकर तृणमूल कांग्रेस की ओर से दायर याचिकाओं के संबंध में ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) में ‘‘शामिल होने वाले’’ 20 सांसदों को जवाब देने के लिए 22 सितंबर तक का समय दिया है।

संसद के सूत्रों ने बताया कि एनसीपीआई सांसदों द्वारा 26 अगस्त को जारी अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगे जाने के बाद यह मोहलत दी गई। नोटिस में सांसदों से सात दिन के भीतर जवाब मांगा गया था।

बिरला ने तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा इन सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिकाएं दायर किए जाने के बाद नोटिस जारी किए थे।

इन 20 सांसदों पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल की हार के बाद जून महीने में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल होने की घोषणा की थी।

बिरला ने उच्चतम न्यायालय द्वारा 25 अगस्त को अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताने के बाद नोटिस जारी किए थे, जिसमें बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं पर अध्यक्ष से जल्द फैसला लेने का अनुरोध किया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने बनर्जी की याचिका पर 20 सांसदों को नोटिस जारी किया था और अध्यक्ष के समक्ष चल रही अयोग्यता की कार्यवाही पर शीघ्रता से कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

अभिषेक बनर्जी ने जून महीने में लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अलग-अलग याचिकाएं दायर कर तृणमूल छोड़कर एनसीपीआई के साथ जाने वाले सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग की थी। इसके बाद अध्यक्ष के नोटिस में सांसदों से सात दिन के भीतर अपना जवाब देने को कहा गया था।

सूत्रों ने बताया कि अतिरिक्त समय मिलने से बागी गुट को कुछ राहत मिली है और वह अयोग्य ठहराने की कार्यवाही के कानूनी एवं राजनीतिक प्रभावों पर विचार कर रहा है।

सूत्रों का कहना है कि ये सांसद दलबदल विरोधी प्रावधानों की उनके मामले में प्रयोज्यता और अध्यक्ष के समक्ष रखे जाने वाले तर्कों को लेकर कानूनी राय भी ले रहे हैं।

भाषा हक हक रंजन

रंजन