नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को भारतीय जनता पार्टी के सदस्य दिनेश शर्मा ने देश के सभी धार्मिक शैक्षणिक संस्थानों के लिए समान कानूनी ढांचे की मांग की और आरोप लगाया कि हिंदू प्रबंधित संस्थानों के साथ भेदभाव हो रहा है।
शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए शर्मा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार देते हैं तथा उन्हें शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम से छूट भी मिलती है, जबकि हिंदू प्रबंधित संस्थानों पर सामान्य संस्थानों की तरह प्रशासनिक और वित्तीय बोझ डाला जाता है।
उन्होंने कहा, “अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में अनुच्छेद 29 और 30 ने संरचनात्मक असमानता पैदा कर दी है।”
दिनेश शर्मा ने अपने तर्क के समर्थन में कई न्यायिक मामलों का उल्लेख किया। उन्होंने 1980 के दशक के एक मामले का जिक्र किया, जिसमें राम कृष्ण मिश्रा ने अपने विद्यालय को सरकारी अधिग्रहण से बचाने के लिए अदालत का रुख किया था। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 1995 में निर्णय दिया कि यह संस्थान हिंदू धार्मिक प्रथा का हिस्सा होने के बावजूद निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करता।
उन्होंने कर्नाटक में आर्य समाज से जुड़े देवी संस्थान और लिंगायत समुदाय के संस्थानों के अपने स्कूलों पर प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने के प्रयासों का भी उल्लेख किया, जो सफल नहीं हो सके।
उन्होंने दावा किया कि कुछ राज्य सरकारें अल्पसंख्यक संस्थानों को वित्तीय सहायता देती हैं, जबकि हिंदू प्रबंधित संस्थानों पर प्रतिबंध लगाती हैं। उन्होंने अनुच्छेद 29 और 30 में संशोधन या उनकी पुनर्व्याख्या कर सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की मांग की।
उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह रहा कि अल्पसंख्यक समुदायों को दी जा रही सुविधाएं छीनी जाएं, बल्कि यह कि हिंदू प्रबंधित संस्थानों को भी वही अधिकार दिए जाएं। एक देश, एक कानून—यह शिक्षा पर भी लागू होना चाहिए।”
भाषा मनीषा अविनाश
अविनाश