नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगाए जाते ही सेना ने वहां अब सख्ती बरतनी शुरु कर दी है। घाटी में आतंकियों के सफाए की जिम्मेदारी अब नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडो, जिन्हें ‘ब्लैक कैट कमांडो’ कहा जाता है, को सौंपी जाएगी। इसके लिए 51 एसएजी के करीब 24 कमांडो का दस्ता दो हफ्ते पहले श्रीनगर के पास हुमहमा बीएसएफ कैंप में पहुंच चुका है।
बता दें ब्लैक कैट कमांडो या एनएसजी कमांडो देश के सबसे खतरनाक कमांडो माने जाते हैं। एनएसजी का गठन 16 अक्टूबर 1984 में किया गया था। इसके गठन का उद्देश्य देश में होने वाली आतंकी गतिविधियों से निपटना था। इन्हें ब्लैक कैट कमांडो इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सिर से पैर तक काली ड्रेस में होते हैं। इनका पूरा शरीर तरह-तरह के उपकरणों, रक्षा-कवचों से लैस होता है। इन कमांडोज़ का नारा होता है, वन फॉर ऑल–ऑल फॉर वन।
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एनएसजी का गठन करते वक्त इजरायल के आत्मघाती कमांडो दस्ते को भी सोचा गया, अमेरिका, रुस ब्रिटेन और फ्रांस के एलीट कमांडो फोर्सेस का भी अध्यायन किया गया। इसके पीछे यह कारण था कि एनएसजी कमांडो दुनिया की बेहतरीन फोर्स बने। आज इन ब्लैक कैट कमांडोज़ की तुलना इजरायल, अमेरिका, रुस और फ्रांस के कमांडो के साथ होती है। इनके समकक्ष एशिया में कोई दूसरी फोर्स नहीं है।
ब्लैक कैट कमांडोज़ की सबसे बड़ी खूबी होती है, बहुत ही त्वरित गति से कार्रवाई और लक्ष्य को हर हाल में खत्म करना या पूरा करना। अपने गठन से अब तक ब्लैक कैट कमांडो 2 दर्जन से ज्यादा खतरनाक ऑपरेशन्स को अंजाम दे चुके हैं और आज तक असफल नहीं हुए हैं।
ऐसे होती है ट्रेनिंग
ब्लैक कैट कमांडोज की टेनिंग बहुत ही कड़ी होती है। जिन सेना के जिन जवानों को ब्लैक कैट की ट्रेनिंग के लिए चुना जात है वे अपनी-अपनी सेना के सर्वश्रेष्ट जवान होते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ब्लैक कैट की ट्रेनिंग के लिए चुने जाते ही साथ उसका ब्लैक कैट कमांडो बन जाना तय हो जाए। इसके बाद भी उनका सलेक्शन कई चरणों में होता है। 90 दिन की कड़ी ट्रेनिंग से पहले ही एक सप्ताह की विशेष ट्रेनिंग होती है। इस एक हफ्ते की विशेष ट्रेनिंग में 15-20 प्रतिशत सैनिक दौड़ से बाहर हो जाते हैं। इसके बाद जो जवान बचते हैं, और अगर उन्होंने 90 दिन की ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी कर ली तो फिर वे बनते हैं ऐसे ब्लैक कैट कमांडो जिसके लिए असफलता नाम की कोई चीज ही नहीं होती।
ऐसे समझिए
एनएसजी या ब्लैक कैट कमांडोज़ की ट्रेनिंग का आप अनुमान भी नहीं लगा सकते। जिसे चुना जाता है उसे 90 दिन की ट्रेनिंग पूरी करनी होती है। इसमें शुरुआत में ही जवान को 18 मिनट दिए जाते हैं, जिसमें उसे 26 तरह के करतब करने होते हैं, साथ ही 780 मीटर की बाधाओं को भी पूरा करना होता है। चुना गया जवान अगर 20 से 25 मिनट में भी इसे पूरा नहीं कर पाता तो वह रिजेक्ट हो जाता है। दरअसल ट्रेनिंग के बाद इन्हें ऑपरेशन्स के दौरान 18 मिनट में ही सब कुछ करना होता है, इसलिए ही उन्हें इस तरह की ट्रेनिंग दी जाती है।
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इसके अलावा अगर कोई कमांडो अगर ए-श्रेणी का कमांडो बनना चाहता है तो उसे यह पूरा कोर्स 18 की बजाय 9 मिनट में ही पूरा करना होता है। किसी भी चुने गए कमांडो को नब्बे दिनों की ट्रेनिंग के दौरान 50 से 62 हजार गोलियां चलाकर फायर प्रैक्टिस करनी होती है। जबकि कोई एक सामान्य सैनिक पूरी जिंदगी में फायर प्रैक्टिस के दौरान इतनी गोलियां नहीं चलाता। ट्रेनिंग के दौरान कई बार तो ऐसा भी होत है कि चुने गए जवान को एक ही दिन में 2 से 3 हजार फायर करना होता है। इस दौरान इन्हें 25 सेकंड के अंदर 14 अलग-अलग टारगेट पर फायर करना होता है।
इतना होता है कार्यकाल
चुने गए कमांडोज़ की कार्यकाल ज्यादा से ज्यादा 5 साल की होती है। 5 साल के लिए भी सिर्फ 20 फीसदी को ही रखा जाता है, बाकी को 3 साल में ही उनकी मूल सेना में वापस भेज दिया जाता है। एनएसजी का मुख्यालय दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर हरियाणा के मानेसर में है।
वेब डेस्क, IBC24