पुताई का काम करने वाले बूंदी के छात्र ने नीट में 99.16 ‘पर्सेंटाइल’ हासिल किए

पुताई का काम करने वाले बूंदी के छात्र ने नीट में 99.16 ‘पर्सेंटाइल’ हासिल किए

पुताई का काम करने वाले बूंदी के छात्र ने नीट में 99.16 ‘पर्सेंटाइल’ हासिल किए
Modified Date: July 19, 2026 / 04:24 pm IST
Published Date: July 19, 2026 4:24 pm IST

कोटा, 19 जुलाई (भाषा) राजस्थान में बूंदी जिले के 19 वर्षीय सूरज सैनी की जिंदगी में बृहस्पतिवार रात उस समय उम्मीद की नयी किरण जगी, जब राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के नतीजे घोषित किए गए।

गुजर-बसर के लिए वर्षों से रंगाई-पुताई का काम करने वाले सूरज ने नीट में 99.16 ‘पर्सेंटाइल’ हासिल किए, जिससे उसके मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने और डॉक्टर बनने की राह खुल गई और अब वह ‘ब्रश’ की जगह आला थामे नजर आएगा।

कापरेन कस्बे के रहने वाले सूरज ने नीट में 583 अंकों के साथ अखिल भारतीय स्तर पर 16,569वीं और अन्य पिछला वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में 7,800वीं रैंक हासिल की, जिससे उसे किसी प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेज में आसानी से दाखिला मिल सकेगा।

कोटा स्थित ‘एलन करियर इंस्टिट्यूट’ के छात्र सूरज के लिए यह उपलब्धि सिर्फ एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्षों से भरे बचपन से निकलकर नए जीवन की ओर बढ़ाया गया एक बड़ा कदम है। आर्थिक तंगी और माता-पिता के अलगाव जैसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने यह मुकाम हासिल किया।

सूरज की कहानी कठिन संघर्ष, अटूट हौसले और बेहतर जीवन हासिल करने के अथक प्रयासों की मिसाल है। सूरज अपनी मां घीसी बाई और छोटी बहन गरिमा के साथ रहता है। घीसी बाई खेतिहर मजदूर हैं, जबकि गरिमा को आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। सूरज के पिता परिवार से अलग रहते हैं।

सूरज ने कक्षा आठ तक की पढ़ाई कापरेन के एक सरकारी स्कूल से की। माता-पिता के अलगाव के बाद वह अपनी मां और बहन के साथ तालेड़ा क्षेत्र के अलकोदिया गांव स्थित अपने ननिहाल में रहने लगा। वहीं, उसने स्थानीय स्कूल में कक्षा नौ में दाखिला लिया और मन लगाकर पढ़ाई की।

उसने कक्षा 10 में 87 फीसदी और कक्षा 12 में 85 फीसदी अंक हासिल किए। जोधपुर के स्वास्थ्य विभाग में एएनएम के पद पर कार्यरत अपनी मौसी से प्रेरित होकर उसने जीव विज्ञान विषय चुना और डॉक्टर बनने का सपना देखा।

हालांकि, परिवार के लिए रोजमर्रा के खर्च पूरे करना लगातार एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। विपरीत परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय सूरज ने जिम्मेदारी उठाई और अपने मामा के मार्गदर्शन में रंगाई-पुताई का काम सीखा। वह छुट्टियों के दिन और स्कूल के बाद के समय में पुताई का काम करता था, ताकि घर का खर्च चलाने में मां की मदद कर सके।

सूरज के मुताबिक, बचपन में अपनी मां को दिनभर खेतों में पसीना बहाता देख उसे डॉक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत करने की प्ररेणा मिली।

उसने कहा, ‘‘मैं अपने परिवार को गरीबी और मुश्किल हालात से बाहर निकालना चाहता था। हमारी आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मेरी बहन को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी, लेकिन अब मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि वह अपनी शिक्षा दोबारा शुरू करे।’’

सूरज ने कहा, ‘‘मेरी मां ने खेतों में मजदूरी करके और मुझे पुताई के काम से मिलने वाले पैसे बचाए। कुछ साल पहले हमने अलकोदिया गांव में दो कमरों और बरामदे वाला खुद का घर बनाया। मैंने पूरे घर की पुताई खुद की।’’

सूरज के अनुसार, कोटा के ‘एलन करियर इंस्टिट्यूट’ और ‘एलएन माहेश्वरी परमार्थ ट्रस्ट’ के शिक्षा संबल कार्यक्रम के बिना वह इस परीक्षा में इतनी बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाता। इस योजना के तहत जरूरतमंद और वंचित छात्रों को नि:शुल्क कोचिंग के साथ रहने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई।

उसने 2024 में कक्षा 12 की पढ़ाई के दौरान पहली बार नीट परीक्षा दी। इसके बाद उसने एक साल तक घर पर खुद से पढ़ाई की और वर्ष 2025 में फिर से परीक्षा दी। लेकिन सूरज के जीवन में असली बदलाव तब आया, जब उसका चयन ‘एलन करियर इंस्टिट्यूट’ के शिक्षा संबल कार्यक्रम के लिए हुआ। 2026 में अपने तीसरे प्रयास में उसने नीट सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली।

‘एलन करियर इंस्टिट्यूट’ के निदेशक और ‘एलएन माहेश्वरी परमार्थ ट्रस्ट’ के ट्रस्टी नवीन माहेश्वरी ने कहा, ‘‘हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र अक्सर अवसरों और संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। हमने यह कार्यक्रम खासतौर पर ऐसे छात्रों के लिए ही शुरू किया था। इसके इतने सकारात्मक परिणाम देखकर बहुत खुशी और संतोष होता है।’’

भाषा पारुल नेत्रपाल

नेत्रपाल


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