नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्र से पूछा कि एक साल बीत जाने के बाद भी उसने उस याचिका पर जवाब दाखिल क्यों नहीं किया, जिसमें चिकित्सा उपचार के दौरान समलैंगिक जोड़ों को ‘चिकित्सकीय प्रतिनिधि’ के तौर पर मान्यता देने का अनुरोध किया गया है।
अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि जब लोगों को समलैंगिक साथियों के साथ ‘लिव-इन’ रिश्ते में रहने की इजाजत है, तो अधिकारियों को उसी के अनुसार नियमों में बदलाव करने होंगे।
अदालत ने केंद्र को याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने कहा, ‘‘कानून एक पुरुष और महिला के बीच लिव-इन संबंध को मान्यता देता है। तो यह दो पुरुषों के बीच लिव-इन संबंध को क्यों नहीं मानेगा?’’
उन्होंने कहा, ‘‘जब भी कोई व्यक्ति ऐसा रास्ता चुनता है, जिस पर ज्यादातर लोग नहीं चलते, तो उसे निशाना बनाया जाता है या नीची नजर से देखा जाता है; या हो सकता है कि नीची नजर से न देखा जाए, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया जाता। मेरे पास ऐसे कई मामले हैं, जिनमें परिवार ऐसे लोगों को छोड़ देते हैं और उनके रिश्ते को स्वीकार नहीं करते।’’
अदालत ने जुलाई 2025 में केंद्र और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को नोटिस जारी किया था। उसने पूछा कि अधिकारियों ने अभी तक अपना जवाब दाखिल क्यों नहीं किया।
अदालत ने कहा, ‘‘आपको मुझे बताना होगा कि आपका रुख क्या है। यह लड़ाई किस लिए है?’’
सरकारी वकील ने अदालत से कुछ समय मांगा, ताकि वह अधिकारियों से निर्देश ले सकें, क्योंकि उनकी नियुक्ति हाल ही में हुई है।
समलैंगिक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल ने कहा कि अदालत ने जुलाई में केंद्र को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आखिरी मौका दिया था, लेकिन वह अभी तक दाखिल नहीं किया गया है।
अदालत एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो 2015 से अपनी साथी के साथ रिश्ते में थी और दोनों ने 2023 में न्यूजीलैंड में शादी की थी।
याचिका में अदालत से ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करने का आग्रह किया गया है, जिनके तहत अस्पतालों या डॉक्टरों को गैर-विषमलैंगिक साथियों को ‘चिकित्सकीय प्रतिनिधि’ के रूप में मान्यता देने और इलाज के दौरान उन्हें मरीज तक पहुंच की अनुमति देने का निर्देश दिया जाए।
‘चिकित्सकीय प्रतिनिधि’ के रूप में मान्यता देने से आशय किसी समलैंगिक जोड़े में एक साथी को दूसरे साथी के इलाज से जुड़े फैसले लेने, चिकित्सा जानकारी प्राप्त करने या स्वास्थ्य संबंधी मामलों में प्रतिनिधि माने जाने का अधिकार देने से है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, “एक साल बीत जाने के बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया है। हालांकि, मामले की अहमियत और इसके निपटारे के लिए जवाबी हलफनामे की आवश्यकता को देखते हुए अदालत केंद्र को एक हफ्ते के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति देती है।”
उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 सितंबर की तारीख तय की।
भाषा वैभव पारुल
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