केंद्र ‘डिजिटल अरेस्ट’ को अलग अपराध घोषित करने पर करे विचार : न्यायालय
केंद्र ‘डिजिटल अरेस्ट’ को अलग अपराध घोषित करने पर करे विचार : न्यायालय
नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि केंद्र सरकार फौजदारी कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ को औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे कड़ी सजा वाला एक अलग अपराध घोषित करने पर विचार कर सकती है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध का व्यापक होता एक स्वरूप है, जिसमें ठग खुद को कानून प्रवर्तन अधिकारियों, अदालत के कर्मचारियों या सरकारी एजेंसियों के पदाधिकारी बताकर ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं। वे पीड़ितों को ‘डिजिटल मंच पर एक तरह से बंधक बना लेते हैं और उन पर पैसे देने का दबाव डालते हैं।
प्रधान न्याधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में ठोस सबूतों के आधार पर जब किसी आरोपी के खिलाफ अपराध में संलिप्तता की शुरुआती राय बन जाती है, तो उसकी संपत्ति को ‘कुर्क’ किया जा सकता है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ को पहले ही एक अपराध के तौर पर परिभाषित किया गया है। उन्होंने न्यायालय को सूचित किया कि प्रणाली की खामियों का पता लगाने के लिए एक अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी)एक विस्तृत रिपोर्ट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है।
प्रधान न्यायाधीश कांत ने सुझाव दिया, ‘‘शायद आपको फौजदारी कानूनों में ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता है । इसमें जबरन वसूली और डकैती के तत्व भी शामिल हैं। संभवतः, आपको इसे गंभीर परिणामों वाले एक अलग अपराध के रूप में परिभाषित करने की आवश्यकता है, साथ ही यह प्रावधान भी होना चाहिए कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ कुछ पाया जाता है, तो उसकी संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है।’’
न्यायमूर्ति बागची ने ‘डीपफेक’ के खतरे की ओर भी ध्यान दिलाया और ऐसे उभरते हुए ऑनलाइन अपराधों को परिभाषित करने के लिए कानूनी हस्तक्षेप की आवश्यकता को रेखांकित किया।
न्यायमूर्ति ने कहा, ‘‘अब हमारे सामने ‘डीपफेक’ की चुनौती है। इसका इस्तेमाल धोखाधड़ी और प्रतिरूपण के लिए किया जा सकता है। आपके पास जो है उसी से लड़ना होगा, लेकिन आपको उसे तराशना भी होगा। अनुच्छेद 142 के तहत हम किसी अपराध को परिभाषित नहीं कर सकते।’’
केंद्र का पक्ष रखने के लिए पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ‘डीपफेक’ और ‘डिजिटल अरेस्ट’ से निपटने के लिए एक कानून पर काम कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘एक मसौदा विधेयक सामने आने वाला है। संभव है कि इसमें ‘डिजिटल अरेस्ट’, ‘डीपफेक’ और अन्य ऑनलाइन अपराधों से निपटने का प्रावधान हो।’’
वेंकटरमणी ने पीठ को सूचित किया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) पहले से ही 10 करोड़ रुपये और उससे अधिक की साइबर धोखाधड़ी वाले करीब 20 बड़े मामलों की जांच कर रही है, जबकि बाकी मामलों की जांच राज्य पुलिस कर रही हैं।
अटॉर्नी जनरल ने कई सुरक्षा उपायों का अनुरोध करते हुए कहा कि इस मामले में कुछ निर्देश आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि जैसे, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई)को यह निर्देश दिया जाए कि वह ‘ मानक परिचालन प्रक्रिया’ (एसओपी)को औपचारिक रूप से अपनाए और लागू करे। इस एसओपी में यह बताया जाए कि साइबर धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले संदिग्ध ‘बैंक खातों’ से पैसे की निकासी को कुछ समय के लिए रोकने के लिए बैंकों को क्या कार्रवाई करनी चाहिए।
उन्होंने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से शिकायत निवारण मापदंड और पैसे की वापसी के मापदंडों को तेजी से लागू करने, और साइबर-आधारित वित्तीय धोखाधड़ी के कारण बैंक खाते ‘फ्रीज’ करने से जुड़े मामलों का जल्द निस्तारण करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया।
इस पर, पीठ ने कहा कि वह बुधवार को दिशानिर्देश जारी करेगी।
इससे पहले, गृह मंत्रालय ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बढ़ते खतरे से निपटने के संबंध में न्यायालय को सूचित किया कि उसने प्रणाली की खामियों को दूर करने और साइबर अपराध के पीड़ितों को तुरंत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरी अंतर विभागीय समिति (आईडीसी) गठित की है।
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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