आरोपियों की रिहाई को सरल बनाने के लिए केंद्र सरकार लाने वाली है ये नया कानून, SC ने दिए निर्देश

SC ने कहा कि आजादी से पूर्व के युग के दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों में संशोधनों के साथ उसी रूप में आज भी अस्तित्व में है।

आरोपियों की रिहाई को सरल बनाने के लिए केंद्र सरकार लाने वाली है ये नया कानून, SC ने दिए निर्देश

Jihadis attacked jail

Modified Date: November 29, 2022 / 08:58 pm IST
Published Date: July 12, 2022 12:36 am IST

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र सरकार को आपराधिक मामलों में आरोपियों की रिहाई को सरल बनाने और उन्हें जमानत देने के वास्ते एक नया कानून लाने पर विचार करने का निर्देश देते हुए कहा कि स्वतंत्रता कानून में निहित है और इसकी निश्चित रूप से संरक्षण और रक्षा की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, आजादी से पूर्व के युग के दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों में संशोधनों के साथ लगभग उसी रूप में आज भी अस्तित्व में है।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि देश की जेलों में विचाराधीन कैदियों की बाढ़ है और संज्ञेय अपराध के पंजीकरण के बावजूद अधिकांश को गिरफ्तार करने की भी आवश्यकता नहीं हो सकती है।

कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों सहित कई विचाराधीन कैदियों की जमानत याचिकाओं को देखते हुए नए जमानत कानून को तैयार करने पर विचार करने की सिफारिश महत्व रखती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में ऐसी छवि कभी नहीं बन सकती है कि यह पुलिस राज है।

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कई दिशा-निर्देशों को पारित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारत में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि की दर बहुत कम है और जमानत आवेदनों का निर्णय करते समय यह कारक नकारात्मक अर्थों में न्यायालय के जेहन में होता है।

‘‘अदालतें यह सोचती हैं कि सजा की संभावना दुर्लभता के करीब है, कानूनी सिद्धांतों के विपरीत जमानत आवेदनों पर सख्ती से फैसला करना होगा। हम एक जमानत आवेदन पर विचार नहीं कर सकते हैं, जो प्रकृति में दंडात्मक नहीं है।’’

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न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने कई दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां ​​और उनके अधिकारी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41-ए (आरोपी को पुलिस अधिकारी के समक्ष पेश होने का नोटिस जारी करना) का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों से उन विचाराधीन कैदियों का पता लगाने को भी कहा, जो जमानत की शर्तों को पूरा करने में समर्थ नहीं हैं। न्यायालय ने ऐसे कैदियों की रिहाई में मदद के लिए उचित कदम उठाने का भी निर्देश दिया।

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शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों और राज्यों व केंद्र-शासित प्रदेशों की सरकारों से चार महीने में इस संबंध में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा एक व्यक्ति की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में फैसला सुनाए जाने के दौरान ये दिशा-निर्देश जारी किए।

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