जोधपुर, 21 फरवरी (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि ‘‘कानून समाज को निरंकुशता से बचाने के लिए बनाया गया एक किला बनकर नहीं रह सकता’’ और उन्होंने युवा वकीलों से इसे एक ऐसा ‘‘मंच’’ बनाने का आह्वान किया जहां मतभेदों पर बहस हो, अधिकारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जाए और सत्ता के साथ तर्क-वितर्क किया जाये।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यहां राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के 18वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पेशेवरों से आग्रह किया कि वे कानून को एक बंद किले के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत, विकसित होते सार्वजनिक स्थान के रूप में देखें।
प्रधान न्यायाधीश ने कानून की ऐतिहासिक यात्रा के लिए एक शक्तिशाली रूपक के रूप में मेहरानगढ़ किले का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ‘‘किले का निर्माण रक्षा के लिए, अव्यवस्था और अनिश्चितता से बचाव के लिए किया जाता है। अपने प्रारंभिक स्वरूप में, कानून भी इसी प्रकार की संरचना के समान था, जिसका उद्देश्य समाज को निरंकुशता और अराजकता से बचाना था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र में, कानून केवल एक किले के रूप में नहीं रह सकता। इसे एक ऐसे मंच में बदलना होगा जहां मतभेदों पर बहस हो, अधिकारों को स्पष्ट किया जाए और सत्ता के साथ तर्क-वितर्क किया जाये।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस बात पर फिर से जोर दिया कि किले से मंच की ओर यह बदलाव न केवल कानूनी प्रणालियों के विकास को दर्शाता है, बल्कि स्नातक होने वाले छात्रों के सामने आने वाली जिम्मेदारी को भी प्रकट करता है।
प्रधान न्यायाधीश ने छात्रों को आगाह किया कि वे कानून को एक पूर्ण विकसित उत्पाद के रूप में न देखें।
न्यायमूर्ति ओलिवर वेंडेल होम्स जूनियर के कथन का हवाला देते हुए उन्होंने याद दिलाया कि विधि का जीवन तर्क पर नहीं बल्कि अनुभव पर आधारित रहा है। उन्होंने कहा कि कानून का विकास समाज के विकास के साथ होता है, और इसकी वैधता परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाने की इसकी क्षमता पर निर्भर करती है।
उन्होंने उल्लेख किया कि भारत में, संविधान का अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समानता की गारंटी के रूप में, औपचारिक आश्वासन के रूप में विकसित होकर वास्तविक निष्पक्षता का एक साधन बन गया है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने युवा वकीलों से आग्रह किया कि वे ‘‘कानून को जटिलता के किले में बदलने का विरोध करें, इसे रहस्यमय न बनाएं बल्कि समझने योग्य बनाएं; मंच को संकीर्ण न करें, बल्कि इसे विस्तृत करें।’’
अपने संबोधन में उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर रुख किया और बार, शिक्षा जगत, सार्वजनिक सेवा और न्यायपालिका में इसके बौद्धिक स्तर और इसके पूर्व छात्रों की उपलब्धियों की प्रशंसा की।
उन्होंने कहा, ‘‘उत्कृष्टता बहिष्कार का कारण नहीं बननी चाहिए।’’
भाषा
देवेंद्र माधव
माधव