बच्चे जानें कि बंटवारा गलत था, इसे कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए: सुधा मूर्ति

बच्चे जानें कि बंटवारा गलत था, इसे कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए: सुधा मूर्ति

बच्चे जानें कि बंटवारा गलत था, इसे कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए: सुधा मूर्ति
Modified Date: January 17, 2026 / 05:43 pm IST
Published Date: January 17, 2026 5:43 pm IST

    ( मानिक गुप्ता)

जयपुर, 17 जनवरी (भाषा) मशहूर लेखिका सुधा मूर्ति ने शनिवार को यहां कहा कि भारत के अतीत, खासकर बंटवारे की कहानी बच्चों के लिए समझना ज़रूरी है। मूर्ति ने कहा कि उन्होंने अपनी नयी किताब, ‘द मैजिक ऑफ़ द लॉस्ट इयररिंग्स’ में जानबूझकर इस संवेदनशील विषय को उठाया है, ताकि युवा पाठकों को यह एहसास हो सके कि यह एक ‘गलती’ थी, जिसे कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए।

    उन्नीसवें ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ (जेएलएफ) में सुधा मूर्ति ने कहा कि अपने नए उपन्यास में इतिहास के इस दर्दनाक अध्याय को खोजने की प्रेरणा उन्हें अपनी नातिन, अनुष्का सुनक से मिली।

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उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी नातिन को यह समझाना था कि “अगर आप इतिहास नहीं जानते, तो आप अपना भविष्य नहीं समझ पाएंगे… जब मैं बंटवारे को देखती हूं, तो मुझे हमेशा लगता है कि मुझे बच्चों को बताना चाहिए— यह हुआ था। जो हुआ वह गलत था और इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए। मुझे उन लोगों के लिए बहुत दुख हुआ जो आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश से पलायन कर गए थे।”

    उनकी नातिन पर ही किताब का मुख्य किरदार, नूनी आधारित है। सुधा मूर्ति को सुनने के लिए सभी उम्र के लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे।

    राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि एक ऐसे व्यक्ति ने, जिसे भारत के बारे में कुछ नहीं पता था – उसकी संस्कृति या उसकी भाषाओं के बारे में कुछ नहीं जानता था, उसने एक पेंसिल ली और एक लाइन खींच दी, और कहा कि उस पल से यह ज़मीन अब उनकी नहीं रही और एक विदेशी ज़मीन बन गई। यह कितना दिल तोड़ने वाला है।”

    अपने निजी अनुभव से मूर्ति ने अपने दामाद और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के परिवार के इतिहास का ज़िक्र किया, जिनके परिवार को दो बार विस्थापित होना पड़ा — पहली बार बंटवारे के दौरान और बाद में अफ्रीका में।

    पचहत्तर वर्षीय सुधा मूर्ति ने बताया कि सुनक के दादा-दादी मूल रूप से उन इलाकों के थे, जो अब पाकिस्तान में हैं और बंटवारे के दौरान उन्हें सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा था। नैरोबी में अपनी ज़िंदगी फिर से बनाने के बाद, उन्हें फिर से विस्थापित होना पड़ा और आखिरकार वे लंदन चले गए, जब सुनक के पिता दस साल के थे।

    मूर्ति ने कहा, ”बार-बार अपना घर खोना एक ऐसी मुश्किल है, जिसे बहुत कम लोग सच में समझ पाते हैं। उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा, कारोबार और बाकी सब धन संपत्ति छोड़नी पड़ी। अफ्रीका में अपनी ज़िंदगी फिर से बनाई, और लंदन में बसने से पहले उन्हें फिर से विस्थापित होना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा कि वह अपनी नातिन को यही समझाना चाहती थीं कि आज लोग जिस शांति का आनंद लेते हैं, उसके पीछे कितने प्रयास और बलिदान है।

उन्होंने समझाया, ‘मैं उसे बताना चाहती थी कि ज़मीन और आज़ादी आसानी से नहीं मिलती। हमारे पूर्वजों ने बहुत मेहनत की, एक से ज़्यादा बार अपने घर खोए, और फिर भी हिम्मत से अपनी ज़िंदगी फिर से बनाई।’

बंटवारे पर सुधा मूर्ति ने रातों-रात अपने ही देश में शरणार्थी बन गए लोगों के सदमे का वर्णन किया।

उन्होंने विशेष रूप से सिंधी समुदाय के लिए चिंता व्यक्त की, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें एक अपरिवर्तनीय सांस्कृतिक नुकसान हुआ है।

उन्होंने कहा, ‘कम से कम पंजाब में, बंटवारे के बाद, पंजाबी एक और ज़मीन ढूंढ पाए, जिसे पंजाब कहा जाता था, जहाँ उनकी भाषा बोली जाती थी। बंगाल के साथ भी ऐसा ही है। लेकिन सिंधियों के लिए नुकसान कहीं ज़्यादा गहरा था। उन्होंने न केवल अपनी ज़मीन खोई, बल्कि उन्हें अपनी कोई ज़मीन नहीं मिली।

मूर्ति ने कहा, ‘उन्होंने अपनी ज़मीन, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति खो दी। अगली पीढ़ी हिंदी बोलने लगी, और तीन पीढ़ियों के भीतर, सिंधी उन भाषाओं में से एक बन गई, जिन्हें भुला दिया गया।’’

हालांकि, उन्हें विस्थापन का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है और उन्होंने अपना पूरा जीवन कर्नाटक में बिताया है। मूर्ति ने कहा कि लगभग दो दशक पहले पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान बंटवारे के सदमे के परिणाम ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया — एक बार तक्षशिला संग्रहालय में और दूसरी बार जब वह एक दोस्त के साथ उसके बंटवारे से पहले के घर गई थीं।

मूर्ति ने याद किया कि एक संग्रहालय में उनसे ज़्यादा प्रवेश शुल्क लिया गया, क्योंकि वह एक विदेशी थीं। उन्होंने कहा, ‘मुझे इस बात का बहुत दुख हुआ कि मेरा इतिहास, खाना और परंपराएं एक जैसी थीं, फिर भी सिर्फ़ एक बॉर्डर खींचने की वजह से मैं एक विदेशी बन गई।’

दूसरी घटना, लाहौर में एक दोस्त के पुश्तैनी घर जाना, जहाँ आम के पेड़ से लेकर पुराने सीमेंट में बने पैरों के निशान तक, निजी यादें अभी भी वैसी ही थीं।

मूर्ति ने कहा, ‘उसका दुख देखकर मुझे एहसास हुआ कि एक गलत फैसला बच्चों की पीढ़ियों को कैसे प्रभावित कर सकता है।’

उनका नवीनतम उपन्यास, उनकी सबसे ज़्यादा बिकने वाली ‘मैजिक सीरीज़’ का तीसरा उपन्यास है, जो नूनी के अपने नाना-नानी के साथ छुट्टियों की योजना बनाने से शुरू होता है और यात्रा के पहले पड़ाव में उसे झुमकों की एक जोड़ी मिलती है, जो गलती से उसके सामान में आ गई थी।

जल्द ही झुमकों के असली मालिक की तलाश शुरू होती है, जो भारत के विभाजन, विस्थापन और कई अन्य संवेदनशील मुद्दों को सामने लाती है।

मूर्ति ने 50 किताबें लिखी हैं, जिनका विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

यह पाँच दिवसीय साहित्यिक उत्सव जेएलएफ 350 से ज़्यादा जाने-माने लेखकों और विद्वानों की मेज़बानी कर रहा है, जिनमें बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक, शतरंज के दिग्गज विश्वनाथन आनंद, ब्रिटिश अभिनेता और लेखक स्टीफन फ्राई, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अनुराधा रॉय, अनुभवी फिल्म समीक्षक भावना सोमाया, लेखक मनु जोसफ, रुचिर जोशी और केआर मीरा शामिल हैं।

यह उत्सव 19 जनवरी को समाप्त होगा।

भाषा नरेश पवनेश दिलीप

दिलीप


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