आयोग ने इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण सामग्री संबंधी ‘पेड’ विज्ञापनों का संज्ञान लिया

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आयोग ने इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण सामग्री संबंधी 'पेड’ विज्ञापनों का संज्ञान लिया

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  • Publish Date - September 3, 2026 / 05:05 PM IST,
    Updated On - September 3, 2026 / 05:05 PM IST

नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने उन खबरों का संज्ञान लिया है जिनमें आरोप लगाया गया है कि मेटा के मालिकाना हक और संचालन वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित ‘पेड’ विज्ञापनों ने भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा दिया या उस तक पहुंच आसान बनाई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने, तीन सितंबर की कार्यवाही के अनुसार, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो हफ्ते के अंदर विशिष्ट और बिंदुवार रिपोर्ट मांगी है।

कार्यवाही में कहा गया, ‘‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को खास तौर पर पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 19 के पालन की पुष्टि करनी होगी, या अगर रिपोर्ट नहीं की गई है, तो इसके कारण बताने होंगे और जिम्मेदार अधिकारी/प्राधिकार की पहचान करनी होगी। इस मामले को मध्यस्थ के नियमों के पालन से जुड़े किसी सामान्य या व्यापक जवाब पर नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि इसका जवाब खास तौर पर और उस समय के रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाना चाहिए।’’

मेटा प्लेटफॉर्म की ओर से इस पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

कार्यवाही में कहा गया, ‘‘आयोग ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की उन खबरों का संज्ञान लिया, जिनमें आरोप लगाया गया था कि मेटा प्लेटफॉर्म इंक के मालिकाना हक और संचालन वाले इंस्टाग्राम पर प्रदर्शित किये जाने वाले पेड विज्ञापनों ने भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा दिया या उस तक पहुंच आसान बनाई।’’

उन्होंने बताया कि जिन विज्ञापनों की बात हो रही है, उनमें कथित तौर पर ‘‘दुष्कर्म के वीडियो’’ और ‘‘बच्चों के वीडियो’’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था और वे उपयोगकर्ता को एक ‘मैसेंजर सर्विस’ के चैनलों पर भेजते थे, जहां कथित तौर पर ऐसी सामग्री (बाल यौन शोषण सामग्री/बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार) बिक्री के लिए उपलब्ध थी।

यह भी बताया गया कि शिकायत तंत्र के जरिए सूचित किये जाने के बावजूद, ये विज्ञापन ‘‘मेटा की समीक्षा प्रक्रिया से गुजरे और लोगों को दिखते रहे’’, जब तक कि बीबीसी ने विशेष रूप से मेटा का ध्यान इस ओर नहीं दिलाया।

कार्यवाही में कहा गया है, ‘‘अगर ये आरोप साबित हो जाते हैं, तो इनसे बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण, बाल यौन शोषण सामग्री/बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार के प्रसार और उससे पैसे कमाने, संभावित संगठित आपराधिक गतिविधियों, और मध्यस्थों द्वारा जरूरी सावधानी बरतने, विज्ञापनों की समीक्षा, सामग्री की निगरानी करने और बच्चों की सुरक्षा के उपायों में खामियों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।’’

इस मामले में शिकायतकर्ता नमो फाउंडेशन है।

कार्यवाही में कहा गया है कि इस मामले की जांच यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और लागू मध्यस्थ ढांचे के तहत की जानी चाहिए। इसमें इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखना और उनकी फोरेंसिक जांच, विज्ञापन देने वालों, प्रकाशकों, फायदा उठाने वालों और इसमें शामिल अन्य लोगों की पहचान करना, वित्तीय लेन-देन का पता लगाना, पीड़ित बच्चों की पहचान, बचाव और पुनर्वास, तथा संबंधित मध्यस्थ और उनके अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना शामिल है।

आयोग ने कहा कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वह इस मामले की जांच कराएं और की गई कार्रवाई की एक खास और बिंदुवार रिपोर्ट सौंपें।

एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस से कहा कि आयोग के पूर्व के नोटिस के जवाब में उनके द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को रिकॉर्ड में ले लिया गया है।

कार्यवाही के विवरण में कहा गया, ‘‘दिल्ली के पुलिस आयुक्त को मांगी गई अतिरिक्त जानकारी/विवरण देने और की गई कार्रवाई की अद्यतन रिपोर्ट जमा करने के लिए और दो हफ्ते का समय दिया गया है। इस रिपोर्ट में खास तौर पर मामले में की गई कार्रवाई और टेलीग्राम से मांगी गई या मिली जानकारी (अगर कोई हो) के साथ-साथ उस पर की गई आगे की कार्रवाई का भी जिक्र होना चाहिए।’’

भाषा सुभाष नरेश

नरेश