नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) कांग्रेस शासित तीन राज्य केरल, कर्नाटक और तेलंगाना संसद के हालिया मानसून सत्र के दौरान पारित किए गए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि यह ‘‘राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने वाला है’’। सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।
पार्टी से जुड़े सूत्रों ने बताया कि केरल, कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारें इस विधेयक को उच्चतम न्यायालय में जल्द चुनौती दे सकती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यह अधिनियम राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने वाला है। इसके खिलाफ जल्द ही तेलंगाना, कर्नाटक और केरल द्वारा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की जाएगी। इस संदर्भ में झारखंड में सत्तारूढ़ झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) के साथ बातचीत की जा रही है ताकि राज्य की हेमंत सोरेन नीत सरकार भी साथ आ सके।’’
इस अधिनियम में राज्यों को खनिज अधिकारों पर अतिरिक्त कर लगाने से रोकने का प्रावधान किया गया है।
राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को 13 अगस्त और लोकसभा ने 12 अगस्त को मंजूरी दी थी।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बीते 17 अगस्त को इस विधेयक को अपनी संतुति दी, जिसके बाद यह अधिनियम के रूप में अस्तित्व में आ गया।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त को ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था।
सोरेन ने प्रधानमंत्री से कहा था कि राज्य के शुल्क पर प्रतिबंध से झारखंड की वित्तीय क्षमता काफी प्रभावित हो सकती है और इससे खनन के सामाजिक एवं पर्यावरणीय दुष्प्रभावों से निपटने की राज्य की क्षमता कम हो सकती है।
उनका यह भी कहना था कि राज्य आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में खनन से मिलने वाला राजस्व झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व का 84.9 प्रतिशत था।
संसद में विधेयक पर हुई संक्षिप्त चर्चा का जवाब देते हुए खान मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा था कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य राज्यों की स्वायत्तता या उनके राजस्व अधिकारों में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि पूरे देश में खनिजों की दरों में एकरूपता सुनिश्चित करना है।
रेड्डी ने कहा था कि केंद्र सरकार कोयला, चूना पत्थर, लौह अयस्क, तांबा और मैंगनीज जैसे प्रमुख खनिजों को विनियमित करना चाहती है, जबकि 49 गौण खनिजों के मामले में राज्यों के अधिकार बरकरार रहेंगे।
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