अदालत ने ‘लिव-इन पार्टनर’ को पेंशन में शामिल करने संबंधी याचिका पर केंद्र से विचार के लिए कहा
अदालत ने ‘लिव-इन पार्टनर’ को पेंशन में शामिल करने संबंधी याचिका पर केंद्र से विचार के लिए कहा
नयी दिल्ली, 10 जनवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की उस याचिका पर विचार करे, जिसमें उसने 40 वर्षों से अधिक समय से साथ रह रही अपनी ‘लिव-इन पार्टनर’ और उसके बच्चों का नाम पारिवारिक पेंशन तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पेंशन भुगतान आदेश में शामिल करने का अनुरोध किया है।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी ने कभी भी अपने संबंध को नहीं छिपाया, ऐसे में अपने ‘पार्टनर’ और बच्चों के नाम को परिवार के रूप में शामिल कराने के प्रयास को ‘‘गंभीर कदाचार’’ मानते हुए सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों से वंचित करना त्रुटिपूर्ण है।
पीठ ने 2018 के केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 2012 में सेवानिवृत्त कर्मचारी को मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी लाभ का 50 प्रतिशत रोकने के अधिकारियों के फैसले को बरकरार रखा गया था।
अदालत ने सात जनवरी को सुनाए गए अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता की मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी का 50 प्रतिशत स्थायी रूप से रोकने या याचिकाकर्ता के आश्रितों को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार करने का कोई वैध कारण नहीं मिला।
पीठ ने याचिकाकर्ता को रोकी गई राशि जारी करने के साथ ही विलंबित भुगतान पर वास्तविक भुगतान की तारीख से छह प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देने का आदेश दिया।
पीठ ने पारिवारिक पेंशन और सीजीएचएस (केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना) सुविधाओं के लिए पेंशन भुगतान आदेश में (पार्टनर) और उसके बच्चों का नाम शामिल करने के लिए याचिकाकर्ता की याचिका पर विचार करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जब उसकी पत्नी तलाक के लिए सहमति दिए बिना अलग हो गई, तो उसने 1983 में एक अन्य महिला के साथ रहना शुरू कर दिया और उनके रिश्ते से दो बच्चे भी पैदा हुए।
उसे (कर्मचारी) एक अन्य महिला के साथ रहकर अपनी पत्नी और बेटी की उपेक्षा करने के आरोप में 1990 में विभागीय कार्यवाही का सामना करना पड़ा और परिणामस्वरूप चार साल की अवधि के लिए चार चरण में वेतन में कटौती का दंड भुगतना पड़ा।
सेवानिवृत्ति से पहले, 2011 में अपनी साथी और बच्चों के लिए राजनयिक पासपोर्ट को लेकर आवेदन करते समय कथित गलतबयानी को लेकर याचिकाकर्ता के खिलाफ एक और अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई, जिसके कारण उसकी मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी लाभ का 50 प्रतिशत रोकने का जुर्माना लगाया गया था।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा के दौरान पत्नी की लगातार अनुपस्थिति, साथ ही अपने ‘लिव-इन’ रिश्ते का खुलासा किया था, इसलिए राजनयिक पासपोर्ट प्राप्त करने को लेकर तथ्य छिपाने का या कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था।
अदालत ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि याचिकाकर्ता ने कभी भी अपने रिश्ते को छिपाया नहीं…उसने सेवा रिकॉर्ड में लगातार (अपने लिव-इन पार्टनर के अस्तित्व) और उसके बच्चों का खुलासा किया, पारिवारिक पेंशन लाभ के प्रयोजनों के लिए लंबे समय तक सहजीवन के आधार पर उसे अपनी पत्नी के रूप में बताया।’’
इसने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक प्राधिकार का यह दावा भी गलत है कि याचिकाकर्ता में व्यक्तिगत निष्ठा की कमी है।
भाषा आशीष नेत्रपाल
नेत्रपाल

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