न्यायालय के बार संगठनों ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान छात्रों, वकीलों पर पुलिस कार्रवाई की निंदा की

न्यायालय के बार संगठनों ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान छात्रों, वकीलों पर पुलिस कार्रवाई की निंदा की

न्यायालय के बार संगठनों ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान छात्रों, वकीलों पर पुलिस कार्रवाई की निंदा की
Modified Date: July 22, 2026 / 05:42 pm IST
Published Date: July 22, 2026 5:42 pm IST

नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय के दो अधिवक्ता संगठनों ने जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान छात्रों और वकीलों पर पुलिस की कार्रवाई की बुधवार को निंदा की तथा ‘अत्यधिक बल प्रयोग’ के आरोपों की निष्पक्ष जांच करके जिम्मेदारी तय करने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने अपने अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की अध्यक्षता में पारित एक प्रस्ताव में कहा कि पुलिस कार्रवाई में कई छात्र और एसोसिएशन के सदस्यों के अलावा कानून बिरादरी के कई सदस्य भी घायल हुए।

एक अलग बयान में ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (एससीएओआरए) ने ‘‘उन खबरों और दृश्यों पर गहरी चिंता जताई, जिनमें सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता और देश के युवाओं के भविष्य को लेकर अपनी शिकायतें शांतिपूर्ण ढंग से रखने के लिए एकत्र हुए छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा बल प्रयोग दिखाया गया है।’’

एससीबीए सचिव प्रज्ञा बघेल द्वारा जारी प्रस्ताव में कहा गया, ‘शांतिपूर्ण छात्रों और अधिवक्ताओं के खिलाफ अत्यधिक एवं असंगत बल प्रयोग बेहद चिंताजनक है और लोकतांत्रिक समाज में पूरी तरह अस्वीकार्य है।’

बार संगठन ने संबंधित प्राधिकारियों से घटना की तत्काल, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने, कथित अत्यधिक बल प्रयोग के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने तथा कानून के अनुसार उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की।

इसने घायल छात्रों और विधि बिरादरी के सभी सदस्यों को समुचित चिकित्सा सुविधा एवं सहायता उपलब्ध कराने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने का भी प्राधिकारियों का आह्वान किया।

प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘एसोसिएशन सभी घायलों के साथ एकजुटता व्यक्त करता है और संवैधानिक अधिकारों, मानवीय गरिमा तथा कानून के शासन की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है।’’

एससीएओआरए ने भी अपने प्रस्ताव में कहा, ‘संवैधानिक लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति विद्रोह का कार्य नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के तहत प्रदत्त मौलिक स्वतंत्रताओं का प्रयोग है। हालांकि, राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन इन स्वतंत्रताओं पर लगाया गया हर प्रतिबंध वैधता, आवश्यकता और अनुपातिकता की संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।’’

उसने प्राधिकारियों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता मिले तथा भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार संयम, संवाद और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप किया जाए।

प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘हमारे गणराज्य की ताकत असहमति को दबाने में नहीं, बल्कि संविधान के दायरे में उसकी रक्षा करने में है। संवैधानिक शासन की वास्तविक कसौटी यह नहीं है कि राज्य सहमति पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, बल्कि यह है कि वह शांतिपूर्ण असहमति पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।’’

गौरतलब है कि सोमवार को नीट प्रश्नपत्र लीक मामले और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हजारों छात्रों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी, लेकिन पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़कर और लाठीचार्ज करके उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था।

भाषा अमित सुरेश

सुरेश


लेखक के बारे में