नयी दिल्ली, 21 फरवरी (भाषा) ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) नियमों के देश भर में “असमान” अनुपालन को रेखांकित करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मौजूदा कार्यान्वयन अंतराल के बने रहने के दौरान वर्तमान पीढ़ी आगे के विधायी सुधार की प्रतीक्षा नहीं कर सकती है।
स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार का “अविभाज्य हिस्सा” मानते हुए न्यायालय ने पूरे भारत में लागू होने वाले अनेक निर्देश जारी किए, ताकि कार्यपालिका के पास एक अप्रैल से प्रभावी होने वाले एसडब्ल्यूएम नियम, 2026 को लागू करने के लिए आवश्यक तंत्र उपलब्ध हो।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि नगर ठोस अपशिष्ट की अनदेखी करने से स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा और जब दुनिया तकनीक-संबंधी गतिविधियों में भारत की ओर देख रही है, तब देश को 2026 के नियमों का पूर्ण रूप से अनुपालन करना होगा।
पीठ ने अपने 19 फरवरी के आदेश में कहा, “भारत भर में अपशिष्ट प्रबंधन को नियंत्रित करने वाले एमएसडब्ल्यू/एसडब्ल्यूएम नियमों का अनुपालन असमान बना हुआ है। स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण अनिवार्य होने के बावजूद, कई शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गीले, सूखे और खतरनाक अपशिष्टों में स्रोत पर पृथक्करण अब भी पूरी तरह से नहीं हो पा रहा है।”
इसमें कहा गया है कि महानगरीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कचरा डालने के स्थल अब भी सक्रिय हैं, हालांकि नवीनतम आदेशों के तहत जैव-उपचार के प्रयास शुरू किए गए हैं।
न्यायालय ने यह आदेश राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के दो अलग-अलग आदेशों से संबंधित दो अपीलों की सुनवाई करते हुए पारित किया, जो भोपाल नगर निगम द्वारा एसडब्ल्यूएम नियम के तहत पर्यावरण अनुपालन से संबंधित हैं।
पीठ ने कहा, “अब करो या मरो की स्थिति है। स्रोत पृथक्करण और बुनियादी ढांचे की मूलभूत तैयारियों के बिना उच्च परिणामों की अपेक्षा करना अनुचित होगा। अपशिष्ट मुक्त भारत के लक्ष्य को साकार करने के लिए प्रत्येक हितधारक का कर्तव्य है।”
इसमें कहा गया है कि आर्थिक अपव्यय में वृद्धि देश के बदलते आर्थिक परिदृश्य से भी जुड़ी हुई है।
पीठ ने कहा कि अदालतों ने बार-बार याद दिलाया है कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह पर्यावरण की रक्षा करे और नागरिकों की भलाई सुनिश्चित करे।
पीठ ने कहा, “पार्षद/महापौर और उनके अध्यक्ष, पार्षद या वार्ड सदस्य, जनता के प्राथमिक निर्वाचित प्रतिनिधि होने के नाते, स्रोत-पृथक्करण शिक्षा के लिए प्रमुख सूत्रधार के रूप में नामित किए जाते हैं। 2026 के नियमों के कार्यान्वयन में अपने वार्ड के प्रत्येक नागरिक को नामांकित करना उनका वैधानिक कर्तव्य है।”
इसमें कहा गया है कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के बुनियादी ढांचे का ऑडिट जिला कलेक्टरों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
न्यायाधीशों ने कहा कि जिला कलेक्टरों को निर्धारित समय सीमा के भीतर मुख्य सचिव को पहचानी गई समस्याओं और हितधारकों द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देनी होगी।
उन्होंने निर्देश दिया कि प्रत्येक स्थानीय निकाय को एक अधिकतम समय-सीमा निर्धारित करनी होगी और उसे संप्रेषित करना होगा, जिसके भीतर 100 प्रतिशत अनुपालन प्राप्त किया जाएगा।
न्यायालय ने कहा, “जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया जाए और उन्हें यह अधिकार दिया जाए कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले निगमों/नगर पालिकाओं/ग्राम पंचायतों द्वारा नगरपालिका में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थापना, कार्यान्वयन और प्रबंधन की निगरानी करें, और किसी भी स्थानीय निकाय/क्षेत्र द्वारा अनुपालन न करने की रिपोर्ट राज्य और केंद्रीय स्तर पर संबंधित विभाग को भेजी जाए।”
इसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वे चार धाराओं वाले पृथक्करण, जिसमें व्यापक अपशिष्ट (गीला, सूखा, स्वच्छता और विशेष देखभाल) शामिल है, के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा सुविधाओं की पहचान करें और उनके लागू करने में तेजी लाएं।
पीठ ने कहा कि स्थानीय निकायों को 2026 के नियमों और उच्चतम न्यायालय के आदेश की एक प्रति सभी चिन्हित व्यापक-अपशिष्ट उत्पादकों को तुरंत सूचित करनी चाहिए, और उन सभी को 31 मार्च तक पूरी तरह से वैधानिक अनुपालन करना होगा।
अदालत ने कहा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को 2026 के नियमों के नियम 33 के तहत उचित निर्देश जारी करने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रथाओं को स्कूल के पाठ्यक्रम में भी उचित रूप से शामिल किया जाए।
अदालत ने कहा कि इन नियमों का पालन न करने को अब महज प्रशासनिक चूक नहीं माना जाएगा और प्रवर्तन के तीन स्तर होंगे, जिनमें अपशिष्ट का स्रोत या स्थानीय अधिकारियों द्वारा प्रारंभिक गैर-अनुपालन के लिए तत्काल जुर्माना लगाना शामिल है।
इसमें कहा गया है कि निरंतर अवहेलना करने पर पर्यावरण कानूनों के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा और यह उन सभी व्यक्तियों पर लागू होगा जो अपने वैधानिक दायित्वों में योगदान देने, सहायता करने या उनकी उपेक्षा करने के लिए जिम्मेदार हैं, जिनमें वे अधिकारी भी शामिल हैं, जो अपने निरीक्षण कर्तव्यों का निर्वाह करने में विफल रहते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ये निर्देश एक अप्रैल, 2026 की प्रभावी तिथि से पहले तैयारी के काम को सुनिश्चित करने के हिस्से के रूप में जारी किए जा रहे हैं।
भाषा प्रशांत दिलीप
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