न्यायालय ने एसआईआर के तहत हटाए गए मतदाताओं के दावों से जुड़े आंकड़ों की याचिका पर नोटिस जारी किया

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न्यायालय ने एसआईआर के तहत हटाए गए मतदाताओं के दावों से जुड़े आंकड़ों की याचिका पर नोटिस जारी किया

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  • Publish Date - July 17, 2026 / 05:56 PM IST,
    Updated On - July 17, 2026 / 05:56 PM IST

नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों द्वारा दाखिल दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ा सार्वजनिक करने के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

अधिवक्ता नेहा राठी के माध्यम से दायर याचिका में पश्चिम बंगाल की एसआईआर प्रक्रिया से संबंधित विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़े सार्वजनिक करने का अनुरोध किया गया है। इसमें स्वीकार और खारिज किए गए फॉर्म-6 और फॉर्म-7 आवेदनों की संख्या के साथ-साथ अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित और निपटाए गए मामलों का विवरण भी मांगा गया है।

बोस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कहा कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए गठित 18 न्यायाधिकरणों के कामकाज के तरीके के कारण व्यावहारिक स्तर पर विसंगतियां और देरी हो रही है।

उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण राज्य में लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और अन्नपूर्णा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित हो रहे हैं तथा उन्हें जाति प्रमाणपत्र भी नहीं मिल पा रहे हैं।

इस पर पीठ ने बिहार एसआईआर मामले में दिए गए अपने फैसले का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग का यह दायित्व है कि जब कोई न्यायाधिकरण यह कहता है कि किसी व्यक्ति का नाम एसआईआर सूची में नहीं होना चाहिए, तो आयोग को नागरिकता अधिनियम के तहत उसकी नागरिकता के निर्धारण के लिए मामला केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजना होगा।’’

पीठ ने कहा, ‘‘नागरिकता तय करने के मामले में निर्वाचन आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है। कानून में कोई भ्रम नहीं है। निर्वाचन आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के पर्यवेक्षण और नियंत्रण तक है।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अब भी 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं और जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें करीब 70 प्रतिशत दावों को स्वीकार किया गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन, जब तक इन अपीलों का निपटारा होता है, तब तक संबंधित लोगों को पीडीएस और अन्य सरकारी योजनाओं से बाहर कर दिया जाता है।’’

पीठ ने इस नयी याचिका को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित एसआईआर से संबंधित अन्य लंबित याचिकाओं के साथ 25 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त अधिकारों को लागू कराने का अनुरोध किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सत्यापन चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके बाद दावों और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख (फॉर्म-6 और 6ए) तथा नाम हटाने के लिए 99 हजार से अधिक (फॉर्म-7) आवेदन प्राप्त हुए। इसके बावजूद 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल लगभग 1.82 लाख नए नाम ही शामिल किए गए।

याचिकाकर्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने विधानसभा क्षेत्रवार यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की है कि कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने स्वीकार किए गए या कितने खारिज हुए। इससे पूरी प्रक्रिया की सार्वजनिक निगरानी और पारदर्शिता सीमित हो गई है।

भाषा शफीक अविनाश

अविनाश