अदालत ने मतदाता सूची में सोनिया गांधी के नाम से संबंधित मामले में फिर से सुनवाई का आदेश दिया

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अदालत ने मतदाता सूची में सोनिया गांधी के नाम से संबंधित मामले में फिर से सुनवाई का आदेश दिया

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  • Publish Date - September 21, 2026 / 10:13 PM IST,
    Updated On - September 21, 2026 / 10:13 PM IST

नयी दिल्ली, 21 सितंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का नाम 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले मतदाता सूची में शामिल किए जाने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के अनुरोध संबंधी याचिका पर फिर से सुनवाई का सोमवार को रास्ता साफ कर दिया।

सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गांधी के खिलाफ आरोपों की जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था।

विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने का यह आदेश राउज एवेन्यू अदालतों की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दायर शिकायत पर मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर आया।

आदेश के महत्वपूर्ण हिस्सों को मौखिक रूप से पढ़ते हुए न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अदालत के आदेश में कानून के प्रति निष्ठा होनी चाहिए, न कि तथ्यों के साथ खिलवाड़। इस कसौटी पर जब यह न्यायालय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) द्वारा पारित किए गए इस आदेश को देखता है, तो इसमें खामियां पाता है।’’

न्यायाधीश ने कहा कि त्रिपाठी की शिकायत थी कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में नयी दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित रूप से अवैध तरीके से दर्ज किया गया था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 1983 में हासिल की थी। हालांकि, नाम 1982 में हटा दिया गया था, लेकिन 1983 में उसे फिर से शामिल कर लिया गया।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इसमें आरोप लगाया गया था कि यह दोबारा नाम शामिल किया जाना भी 30 अप्रैल, 1983 को उनके द्वारा नागरिकता हासिल किए जाने से पहले हुआ था।’’

उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह बिना सबूत के कोरे दावों पर आधारित थी, जिसमें धोखाधड़ी और जालसाजी की जरूरी जानकारी नहीं थी, तथा शिकायत 1980 की अप्रमाणित मतदाता सूची की फोटो कॉपी की फोटो कॉपी पर आधारित थी।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘संसदीय लोकतंत्र में हर नागरिक के लिए मतदाता सूची की पवित्रता एक अटूट विश्वास का विषय है। देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति भी एक मतदाता या नागरिक के तौर पर कम प्रभावशाली लोगों के बराबर ही होता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मतदाता सूची में हेरफेर, किसी मतदाता का नाम धोखाधड़ी से शामिल करने, किसी गैर-नागरिक का नाम दर्ज करने और झूठे घोषणापत्र या दस्तावेजों के संभावित इस्तेमाल से जुड़े किसी भी आरोप पर यह तय करने के लिए कारणों के साथ आदेश जरूरी है कि क्या धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़े आरोपों का खुलासा होता है।’’

उन्होंने कहा कि एसीजेएम के आदेश में इसका कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में कैसे शामिल किया गया, 1982 में हटाया गया और फिर 1983 में दोबारा दर्ज किया गया।

न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित आदेश में यह पता लगाने के बजाय कि क्या इन आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है, शिकायत को बस जरूरी जानकारी की कमी वाला बताकर खारिज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के हिस्से को भी यह कहते हुए सतही तौर पर खारिज कर दिया गया कि यह ‘‘1980 की कथित अप्रमाणित मतदाता सूची के हिस्से की फोटो कॉपी की फोटो कॉपी’’ है।

उन्होंने कहा, ‘‘एसीजेएम के समक्ष सीमित अनुरोध यह था कि मतदाता सूची के अंश और अन्य आरोपों को पर्याप्त माना जाए, या फिर सोनिया गांधी का नाम कथित तौर पर धोखाधड़ी से दर्ज किए जाने के मामले में जांच का आदेश दिया जाए।’’

न्यायाधीश ने कहा कि असल में यह आदेश इस बात पर कोई स्पष्ट कारण नहीं देता कि शिकायत में संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘संबंधित आदेश में कानून का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई, जिसमें संबंधित पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनना और संबंधित थाने से स्थिति रिपोर्ट मंगाना शामिल था।’’

धारा 175(3) किसी संज्ञेय अपराध की जांच के लिए पुलिस को निर्देश देने का अधिकार मजिस्ट्रेट को देती है।

न्यायाधीश ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने कानून के तहत उपलब्ध दोनों विकल्पों पर विचार नहीं किया। पहला, प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देना और दूसरा, बीएनएसएस की धारा 223 के तहत कार्यवाही करना। यह धारा किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायतकर्ता और गवाहों की जांच से संबंधित है।

नागरिकता के मुद्दे पर न्यायाधीश ने कहा कि एसीजेएम को केवल यह तय करना था कि क्या आरोपों से किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है और क्या मामले में पुलिस जांच की जरूरत है। हालांकि, उन्होंने इसे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से जोड़ दिया और विषय से हटकर नागरिकता के मुद्दे पर चले गए।

अदालत ने कहा कि वह यह समझने में असमर्थ है कि एसीजेएम ने मतदाता सूची में लोगों के नाम शामिल करने या हटाने की निर्वाचन आयोग की शक्तियों को, सूची में धोखाधड़ी से नाम शामिल करने या गलत दस्तावेज़ों के इस्तेमाल को साबित करने के मामले में पुलिस के लिए रुकावट क्यों माना।

न्यायाधीश ने कहा कि मजिस्ट्रेट अदालत ने संज्ञेय अपराध के खुलासे का पता लगाने का अपना ‘‘मुख्य काम’’ नहीं किया।

उन्होंने मामले को वापस मजिस्ट्रेट अदालत के पास भेज दिया और उसे बीएनएसएस की धारा 175(3) की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ‘‘कारणों के साथ आदेश’’ पारित करने का निर्देश दिया। साथ ही, शिकायतकर्ता की दलीलों पर नए सिरे से सुनवाई करने को कहा।

मामले में आगे की सुनवाई के लिए 29 सितंबर की तारीख तय की गई है।

भाषा आशीष दिलीप

दिलीप