चंडीगढ़, आठ अप्रैल (भाषा) पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने लुधियाना के दोराहा में 2019 में साढ़े सात-वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के एक मामले में दो आरोपियों को दी गई मौत की सजा रद्द कर दी है।
उच्च न्यायालय ने मामले को निचली अदालत को वापस भेज दिया और उसे आरोपियों के बयान दर्ज करने के चरण से सुनवाई शुरू करने और नया फैसला सुनाने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति सुखविंदर कौर की पीठ ने छह अप्रैल के आदेश में टिप्पणी की, ‘‘यह ऐसा मामला नहीं है, जहां निचली अदालत ने सभी आपराधिक परिस्थितियों को आरोपी के सामने रखा हो।’’
निचली अदालत ने वर्ष 2023 में बलात्कार और हत्या के मामले में दो आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। इस मामले की शुरुआत मार्च 2019 में दर्ज प्राथमिकी से हुई थी।
अदालत ने इस मामले में पीड़िता को ‘लाडली’ कहकर संबोधित किया है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता (लाडली) का कथित तौर पर उसके रिश्ते के एक भाई ने नौ मार्च 2019 को लुधियाना के दोराहा में अपहरण कर लिया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, बाद में सह-आरोपी भी उसके साथ शामिल हो गया और दोनों ने मिलकर एक सुनसान गोदाम में उसके साथ बलात्कार किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बाद दोनों ने उसका गला घोंट दिया और उसके सिर पर ईंटों से वार किए, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई।
बाद में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनायी गई।
उच्च न्यायालय की पीठ ने आरोपियों की अर्जियों पर सुनवाई करते हुए और निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड की पुष्टि के लिए भेजे गए हत्या के संदर्भ का जवाब देते हुए कहा कि प्रमुख चिंता का विषय जांच का तरीका, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत आरोपियों के समक्ष दोषी ठहराने वाले सभी साक्ष्यों को प्रस्तुत नहीं किया जाना और मुकदमे पर इसके प्रभाव हैं।
आरोपियों ने अपनी अर्जियों के माध्यम से अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी थी।
अदालत ने यह भी कहा, ‘‘हमारे विचार में, यदि साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए तो इससे आरोपी को नुकसान हो सकता है।’’
अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों के बयानों को ध्यान से पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि चिकित्सकों के एक दल द्वारा किए गए पोस्टमार्टम के दौरान देखे गए यौन उत्पीड़न और संबंधित चोटों के सबसे महत्वपूर्ण सबूतों को उनके सामने पेश नहीं किया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘लाडली की हत्या बलात्कार के बाद की गई थी और यदि उसके साथ यौन उत्पीड़न न हुआ होता, तो सबूत छिपाने के लिए उसकी हत्या करने का कोई मकसद नहीं होता। इसलिए, मूल रूप से, हम बलात्कार के मामले से निपट रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पीड़िता के साथ बलात्कार का सबूत, आरोपियों के सामने नहीं रखा गया।”
पीठ ने यह भी कहा कि आरोपियों से डीएनए रिपोर्ट के बारे में पूछताछ नहीं की गई।
अदालत ने कहा, ‘‘डीएनए रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है और यदि इसे बीएनएसएस की धारा 351 (313 सीआरपीसी, 1973) के तहत आरोपी को स्पष्टीकरण देने का अवसर दिए बिना साक्ष्य के रूप में पढ़ा जाता है, तो इससे आरोपी के प्रति पूर्वाग्रह उत्पन्न होने की प्रबल संभावना है।”
पीठ ने कहा, “ये सभी कमियां, जो अनियमितताओं के समान हैं, सुधार योग्य हैं और एक बार सुधार हो जाने पर, न तो आरोपी के प्रति कोई पूर्वाग्रह उत्पन्न करेंगी और न ही किसी के साथ अन्याय होगा।”
अदालत ने कहा, “हमारे पास दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करने और मामले को निचली अदालत में वापस भेजने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, ताकि दोनों आरोपियों के बयान दर्ज करने के चरण से सुनवाई फिर से शुरू की जा सके।”
भाषा अमित सुरेश
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