न्यायालय ने एफसीआरए प्रावधानों में संशोधनों की संवैधानिक वैधता को कायम रखा

न्यायालय ने एफसीआरए प्रावधानों में संशोधनों की संवैधानिक वैधता को कायम रखा

न्यायालय ने एफसीआरए प्रावधानों में संशोधनों की संवैधानिक वैधता को कायम रखा
Modified Date: November 29, 2022 / 08:56 pm IST
Published Date: April 8, 2022 8:22 pm IST

नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को विदेशी चंदा (विनियमन) कानून (एफसीआरए), 2010 के प्रावधानों में कुछ संशोधनों की वैधता को बरकरार रखा जो सितंबर 2020 में लागू हुए थे। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि ‘विदेशी चंदे के दुरुपयोग के पिछले अनुभव के कारण सख्त प्रावधान आवश्यक हो गए।’’

न्यायालय ने कहा कि विदेशी चंदा प्राप्त करना ‘पूर्ण या निहित अधिकार’ नहीं हो सकता है और किसी को भी विदेशी दान स्वीकार करने के निहित अधिकार का दावा करते हुए नहीं सुना जा सकता है क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति को विदेशी चंदा से प्रभावित किए जाने की आशंका के सिद्धांत को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है।

गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के विदेशी चंदों के सख्त विनियमन की खातिर किए गए संशोधनों को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च अदालत ने गौर किया कि कि विदेशी चंदा लेने वाले कई संगठनों ने इसका उपयोग उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया जिनके लिए उन्हें पंजीकृत किया गया था। इसके अलावा कई संगठन वैधानिक अनुपालनों को पूरा करने में भी विफल रहे।

न्यायालय ने कहा, ‘… ‘विदेशी चंदे’ के दुरुपयोग के पिछले अनुभव और नियमों के पालन नहीं किए जाने के आधार पर 19,000 पंजीकृत संगठनों के प्रमाणपत्र रद्द करने के पिछले अनुभव के कारण सख्त व्यवस्था आवश्यक हो गई।’

न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने घोषित किया कि 2010 के कानून के संशोधित प्रावधान मुख्य रूप से 7, 12(1ए), 12ए और 17 संविधान और मूल कानून के अनुरूप हैं।

हालांकि पीठ ने धारा 12ए पर आपत्ति जतायी। पीठ ने कहा, ‘‘संक्षेप में, हम घोषणा करते हैं कि 2020 के कानून के संशोधित प्रावधान अर्थात् धारा 7, 12(1ए), 12ए और 17 संविधान और मूल अधिनियम के अंतर्गत आते हैं…।’’ पीठ में न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार भी शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने 132 पृष्ठों का यह फैसला एफसीआरए 2010 के प्रावधानों में संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिया।

पीठ ने कहा कि विदेशी चंदा प्राप्त करना ‘पूर्ण या निहित अधिकार’ नहीं हो सकता । इसके नाम से ही एक राष्ट्र की संवैधानिक नैतिकता समग्रता में इस प्रकार प्रतिबिम्बित होती है कि वह अपनी जरूरतों को पूरा करने और समस्याओं को सुलझाने में सक्षम नहीं है।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि विदेशी चंदे के कारण किसी विदेशी दाता की उपस्थिति हो सकती है और देश की नीतियों को ‘प्रभावित’ किया जा सकता है तथा कोई राजनीतिक विचारधारा को प्रभावित या थोपने की प्रवृत्ति हो सकती है। पीठ ने कहा कि अपने देश में दान देने वालों की कोई कमी नहीं है।

पीठ ने कहा कि यह राज्य पर है और वह विदेशी चंदा प्राप्त करने पर पूरी तरह से रोक लगा सकता है क्योंकि विदेशी चंदा प्राप्त करने के संबंध में नागरिक का कोई अधिकार नहीं है।

न्यायालय ने कहा, ‘वास्तव में, गड़बड़ी को मिटाने के लिए सुधारात्मक व्यवस्था का सहारा लेने के लिए संसद को श्रेय दिया जाना चाहिए और कोई भी संप्रभु देश गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं कर सकता।’

भाषा अविनाश नरेश

नरेश


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