नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को असहाय महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों में संवेदनशीलता बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया और यौन अपराधों से बच्चों की रोकथाम (पॉक्सो) के मामले में एक व्यक्ति की सजा बरकरार रखी।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि निचली अदालत द्वारा दोषसिद्धि और दी गई सजा को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का बरकरार रखना पूरी तरह से न्यायोचित था। पीठ ने कहा, ‘असहाय महिला से जुड़े यौन उत्पीड़न के आरोपों से निपटते समय अदालत को संवेदनशील बने रहना चाहिए।’
शीर्ष अदालत ने फैसले में अपने पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि बलात्कारी ‘न केवल पीड़िता की निजता और सम्मान को चोट पहुंचाता है, बल्कि इस प्रक्रिया में अनिवार्य रूप से गंभीर मनोवैज्ञानिक और शारीरिक नुकसान भी पहुंचाता है।’
पीठ ने अपने निर्णयों का हवाला देते हुए कहा, ‘बलात्कार केवल शारीरिक हमला नहीं है और यह पीड़ित के पूरे व्यक्तित्व को नष्ट कर देता है।’
शीर्ष अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में पीड़िता का सबूत पूरी तरह से ‘‘विश्वसनीय’’ है, जिसने आरोपी द्वारा अपराध किए जाने के बारे में पूरी घटना को स्पष्टता के साथ बताया। पीठ ने कहा, ‘उसकी गवाही पर अविश्वास करने और उसे खारिज करने का कोई कारण नहीं है।’’
इसी प्रकार, पीठ ने महिला के भाई की गवाही का भी जिक्र किया, जिसने पीड़िता के बयान का समर्थन किया।
यह घटना तीन अप्रैल, 2018 को हुई थी, जब 15 वर्षीय पीड़िता और उसका भाई अपने घर के अंदर थे। पीड़िता के माता-पिता अपने परिवार के एक सदस्य के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पड़ोस के गांव गए थे।
नाबालिग लड़की को अकेला पाकर दोषी घर में घुस गया और उसके भाई को तंबाकू का पैकेट लाने के लिए भेजा और नाबालिग से बलात्कार किया।
भाषा आशीष पवनेश
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