समय से पहले जन्मे बच्चों में गंभीर जोखिम की शीघ्र पहचान में कारगर है ‘क्रिब-2’ स्कोर: अध्ययन
समय से पहले जन्मे बच्चों में गंभीर जोखिम की शीघ्र पहचान में कारगर है ‘क्रिब-2’ स्कोर: अध्ययन
जयपुर, 19 जुलाई (भाषा) सवाई मानसिंह (एसएमएस) मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों के एक अध्ययन में पाया गया है कि एक सरल स्कोरिंग प्रणाली समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले नवजात शिशुओं में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की शीघ्र पहचान करने तथा उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ाने में मददगार हो सकती है।
जयपुर के जेके लोन अस्पताल में समय से पहले जन्मे 181 नवजात शिशुओं पर किए गए इस अध्ययन में अस्पताल में भर्ती के तुरंत बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करने के लिए ‘क्रिब-2’ (क्लीनिकल रिस्क इंडेक्स फॉर बेबीज-2) स्कोर की उपयोगिता रेखांकित की गई है।
अध्ययन के निष्कर्ष ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक रिसर्च’ में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन से जुड़े बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. योगेश यादव ने कहा कि इस स्कोर के जरिए शुरुआती आकलन उपचार संबंधी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि भर्ती के समय ही ‘क्रिब-2’ स्कोर की गणना कर ली जाए, तो नवजात की स्थिति की गंभीरता का पता चल जाता है। इससे चिकित्सकों को शुरुआती चरण में ही सही उपचार रणनीति तय करने में मदद मिलती है और बच्चे को बचाने की संभावना बढ़ जाती है।’’
अध्ययन में पाया गया कि जिन नवजातों का ‘क्रिब-2’ स्कोर अधिक था, उनमें मृत्यु का जोखिम भी अधिक था। अध्ययन में शामिल शिशुओं की औसत गर्भकाल अवधि लगभग 28.88 सप्ताह थी, जबकि उनका औसत जन्म वजन 1.01 किलोग्राम था, जो सामान्य से काफी कम है।
डॉ. यादव ने स्कोरिंग प्रणाली की व्याख्या करते हुए कहा, ‘‘शून्य से पांच अंक का अर्थ कम जोखिम, छह से 10 अंक मध्यम जोखिम, 11 से 15 अंक उच्च जोखिम और 15 से अधिक अंक अत्यधिक उच्च जोखिम को दर्शाते हैं। स्कोर जितना अधिक होगा, गंभीर बीमारी और मृत्यु का खतरा उतना ही अधिक होगा।’’
उन्होंने बताया कि ‘क्रिब-2’ स्कोर पांच मानकों पर आधारित है- जन्म के समय वजन, गर्भकाल अवधि, भर्ती के समय शरीर का तापमान, रक्त में अम्लीयता (एसिड स्तर) और नवजात का लिंग।
डॉ. यादव ने कहा, ‘‘‘क्रिब-2’ केवल मृत्यु के जोखिम का अनुमान लगाने वाला स्कोर नहीं है, बल्कि नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में उपचार संबंधी निर्णय लेने का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपकरण है। शुरुआती कुछ घंटों में ही इससे यह पहचान की जा सकती है कि कौन-सा नवजात अधिक जोखिम में है।’’
उन्होंने कहा कि यह प्रणाली विशेष रूप से उन परिस्थितियों में अधिक उपयोगी है, जहां चिकित्सा संसाधन सीमित हों।
उन्होंने कहा, ‘‘जब बिस्तर, वेंटिलेटर या प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की संख्या सीमित हो, तब अधिक ‘क्रिब-2’ स्कोर वाले नवजातों को एनआईसीयू में प्राथमिकता दी जा सकती है। यह यह तय करने में भी मदद करता है कि किन नवजातों को तत्काल उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों में रेफर किए जाने की आवश्यकता है।’’
डॉ. यादव ने कहा कि यह स्कोर चिकित्सकों को नवजात के परिजनों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने में भी मदद करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘‘क्रिब-2’ के माध्यम से हम अभिभावकों को बच्चे की स्थिति, संभावित परिणाम और उपचार की आवश्यकता के बारे में अधिक स्पष्ट और सटीक जानकारी दे सकते हैं।’’
उन्होंने कहा कि भारत जैसे सीमित संसाधनों वाले देश में ‘क्रिब-2’ का नियमित उपयोग नवजात शिशुओं की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार ला सकता है और मृत्यु दर कम करने में सहायक हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समय से पहले जन्म भारत में नवजात शिशुओं की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। ऐसे में ‘क्रिब-2’ जैसे सरल और विश्वसनीय उपकरणों का उपयोग समय पर उपचार सुनिश्चित करने और बेहतर परिणाम हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भाषा
बाकोलिया रवि कांत

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