हिरासत में मौत का मामला: न्यायालय ने आरोपी की पुलिस हिरासत पर लगाई गई शर्तों में किया संशोधन

हिरासत में मौत का मामला: न्यायालय ने आरोपी की पुलिस हिरासत पर लगाई गई शर्तों में किया संशोधन

हिरासत में मौत का मामला: न्यायालय ने आरोपी की पुलिस हिरासत पर लगाई गई शर्तों में किया संशोधन
Modified Date: July 27, 2026 / 08:15 pm IST
Published Date: July 27, 2026 8:15 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश में कथित हिरासत में मौत के मामले में आरोपी निलंबित पुलिसकर्मी की पुलिस हिरासत मंजूर करते समय निचली अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों में सोमवार को संशोधन किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रभावी पुलिस पूछताछ में आ रही बाधाओं को लेकर जांच एजेंसी की आशंका उचित थी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार की उस अपील पर सोमवार को अपना फैसला सुनाया, जिसमें सात जुलाई को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने विजयवाड़ा की निचली अदालत के दो जुलाई के उस आदेश में आंशिक संशोधन किया था जिसमें आरोपी पुलिस निरीक्षक को कई शर्तों के साथ पुलिस हिरासत में भेजने की अनुमति दी गई थी।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि छह मई को विजयवाड़ा में गाडे साई कृष्ण की कथित हिरासत में मौत के मामले में एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि प्रभावी पुलिस हिरासत के समय पूछताछ में उत्पन्न हो रही बाधाओं के संबंध में जांच एजेंसी द्वारा जताई गई आशंका वास्तविक और उचित है। ऐसी बाधाएं पूरी जांच प्रक्रिया को विफल कर सकती हैं।’’

पीठ ने कहा कि आरोपों के अनुसार, छह मई को कार्यबल के जवानों ने गाडे साई कृष्ण को हिरासत में लिया था और उसे एक पुलिस थाने लाया गया था।

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़ित को कभी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया और कई गवाहों ने उसे पुलिस थाने में चोटों के स्पष्ट निशानों के साथ देखा था।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मामले की जांच के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने जून में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। इसके बाद मामले के आरोपी पुलिस निरीक्षक को 23 जून को गिरफ्तार कर लिया गया।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी को 24 जून को अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था। इसके बाद अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जिसके चलते उसे राजमहेंद्रवरम केंद्रीय कारागार में रखा गया।

पीठ ने कहा कि 25 जून को अभियोजन पक्ष ने अदालत में अर्जी देकर आरोपी को 12 दिन की पुलिस हिरासत में देने का अनुरोध किया था। अर्जी में कहा गया था कि पीड़ित के साथ क्या हुआ, इसका पता लगाने, सह-आरोपियों की पहचान करने, साक्ष्य बरामद करने और घटनास्थल की कड़ियां जोड़ने के लिए पुलिस हिरासत आवश्यक है।

पीठ ने कहा कि दो जुलाई को न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आरोपी को आठ दिन की पुलिस हिरासत में भेजने की अनुमति दी थी। हालांकि, यह पूछताछ केंद्रीय कारागार परिसर में ही करने का निर्देश दिया गया था और इसके लिए कई शर्तें भी निर्धारित की गई थीं।

निचली अदालत द्वारा लगाई गई कुछ शर्तों को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय का रुख किया। सरकार का तर्क था कि पूरी पुलिस पूछताछ को राजमहेंद्रवरम केंद्रीय कारागार तक सीमित कर देना और पूरी प्रक्रिया की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग (वीडियोग्राफी) अनिवार्य करना जांच एजेंसी की स्वतंत्रता और प्रभावी जांच करने की क्षमता में बाधा डालता है।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की याचिका का निस्तारण करते हुए दो जुलाई के आदेश में आंशिक संशोधन कर दिया।

इसके बाद राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्तों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि ये शर्तें जांच अधिकारी के बिना किसी अनावश्यक प्रतिबंध के स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से जांच करने के अधिकार में सीधे हस्तक्षेप करती हैं।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने अपनी जान और व्यक्तिगत गरिमा को लेकर जो आशंकाएं जताई थीं, उनका पर्याप्त ध्यान उच्च न्यायालय ने रखा था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान आरोपी के साथ किसी प्रकार की धमकी, प्रलोभन, दबाव, शारीरिक हमला या थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

पीठ ने कहा, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में पूरी पुलिस हिरासत में पूछताछ को केवल राजमहेंद्रवरम केंद्रीय कारागार परिसर तक सीमित रखना इस मामले के तथ्यों के आधार पर न तो उचित है और न ही टिकाऊ।’’

न्यायालय ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी को यह स्वतंत्रता होगी कि वह आरोपी से एसआईटी के निर्धारित पूछताछ केंद्र या विजयवाड़ा में पुलिस के पास उपलब्ध किसी अन्य केंद्र में पूछताछ कर सके।

भाषा आशीष नरेश

नरेश


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