व्यभिचार, समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले ‘अच्छे कानून नहीं’: केंद्र

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व्यभिचार, समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले ‘अच्छे कानून नहीं’: केंद्र

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  • Publish Date - April 8, 2026 / 06:28 PM IST,
    Updated On - April 8, 2026 / 06:28 PM IST

नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि व्यभिचार और सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दो अहम फैसले ‘‘संवैधानिक नैतिकता’’ के व्यक्तिपरक इस्तेमाल पर आधारित हैं और इन्हें ‘‘अच्छा कानून नहीं’’ घोषित किया जाना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा केरल के शबरिमला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और कई धर्मों की ओर से अपनाई जाने वाली धार्मिक आजादी के दायरे और संभावनाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह बात कही गई।

शीर्ष अदालत ने धार्मिक आजादी के दायरे पर सात सवाल निर्धारित किए हैं। एक सवाल यह था कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और सीमा क्या है, और क्या इसका मतलब संवैधानिक नैतिकता को शामिल करना है?

दूसरे दिन दलीलें देते हुए, केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा एक भावना है और यह कोई सिद्धांत नहीं है, जिसपर किसी कानून को परखा जा सके।

मेहता ने कहा, ‘‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों से चलने वाले देश में, हमेशा बहुमत का नज़रिया ही हावी होता है, खासकर जब किसी कानून को परखने की बात आती है, क्योंकि बहुमत ही कानून बनाता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘फिर आप उस आधार पर नैतिकता को कैसे परिभाषित करते हैं? उसके बाद, समझ में विकास या बदलाव हो सकता है।’’

न्यायिक समीक्षा के दायरे के मुद्दे पर बात करते हुए, मेहता ने व्यभिचार और सहमति से समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले शीर्ष अदालत के फैसलों का ज़िक्र किया।

प्रवासी भारतीय जोसेफ शाइन की अर्जी पर, 2018 में उच्चतम न्यायालय ने व्यभिचार के अपराध से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था।

साल 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने डांसर नवतेज सिंह जौहर की अर्जी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के पुराने नियमों को कुछ हद तक रद्द करके समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

मेहता ने कहा, ‘‘एक सवाल यह है कि न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या है और संवैधानिक नैतिकता क्या है।’’

भाषा वैभव सुरेश

सुरेश