दिल्ली की अदालत ने दो बेटियों की हत्या की आरोपी महिला की जमानत याचिका खारिज की

दिल्ली की अदालत ने दो बेटियों की हत्या की आरोपी महिला की जमानत याचिका खारिज की

दिल्ली की अदालत ने दो बेटियों की हत्या की आरोपी महिला की जमानत याचिका खारिज की
Modified Date: April 13, 2026 / 11:57 am IST
Published Date: April 13, 2026 11:57 am IST

नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित अपने घर पर पिछले महीने अपनी दो बेटियों की हत्या करने की आरोपी 53 वर्षीय महिला को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने आरोपों को गंभीर बताते हुए और मुख्य गवाह को प्रभावित किए जाने की आशंका जताते हुए सुनीता अरोड़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी। सुनीता भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(1) (हत्या) के तहत दर्ज मामले में 13 मार्च से न्यायिक हिरासत में है।

अभियोजन के अनुसार, महिला के पति सुधीर अरोड़ा ने पांच मार्च को पुलिस नियंत्रण कक्ष पर फोन कर सूचना दी थी कि उसकी पत्नी और दो बेटियां घर का दरवाजा नहीं खोल रहीं जो अंदर से बंद था।

दरवाजा तोड़कर अंदर जाने पर पुलिस ने 34 वर्षीय राधिका अरोड़ा और 28 वर्षीय गुणिशा अरोड़ा को अलग-अलग कमरों में मृत पाया जबकि सुनीता बेहोश मिली। अभियोजन ने आरोप लगाया कि राधिका और गुणिशा की मौत हत्या का मामला है।

अभियोजन ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ‘‘मुख्य संदिग्ध’’ है। उसने उन्हें ‘‘अंतिम बार एक साथ देखे जाने’’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए तर्क दिया कि घटना बंद मकान के भीतर हुई, जहां केवल आरोपी और उसकी दो बेटियां थीं।

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने अदालत से कहा, ‘‘याचिकाकर्ता को यह बताना होगा कि घर की चहारदीवारी के भीतर क्या हुआ था।’’ उन्होंने कहा कि इस स्तर पर आरोपी को रिहा करने से जांच प्रभावित हो सकती है और साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका है।

अभियोजन ने कहा कि घटनास्थल से कई आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुईं, जिनमें ‘सिंक’ के पास खून, खून से सनी टूटी कांच की बोतल, पट्टियां, मिक्सर-ग्राइंडर का ब्लेड, सफेद पाउडर के साथ ओखली-मूसल, नेफ्थलीन की गोलियों का एक खुला पैकेट और फर्श पर मिला पीले रंग का तरल पदार्थ शामिल है। उसने कहा कि ये चीजें पूर्व नियोजित षड्यंत्र की ओर इशारा करती हैं।

हालांकि, बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि मामले में ‘‘गंभीर प्रक्रियागत अनियमितताएं’’ हैं। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने में 52 घंटे से अधिक की देरी हुई।

वकील ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही दोनों बेटियों का जल्दबाजी में अंतिम संस्कार कर दिया गया जिससे आरोपी अपनी बेटियों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सकी क्योंकि उसे प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही पांच मार्च से हिरासत में रखा गया था।

बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि आरोपी और उसकी बेटियां सुधीर द्वारा लंबे समय से घरेलू प्रताड़ना झेल रही थी। वकील ने कहा कि यह मामला ‘‘सोची-समझी हत्या’’ का नहीं, बल्कि ‘‘लगातार क्रूरता के कारण आत्महत्या के लिए उकसाने’’ का है। उन्होंने अपनी दलील को साबित करने के लिए 22 नवंबर 2025 की एक शिकायत का हवाला दिया, जिसमें सुधीर और उसकी बहन द्वारा शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किए जाने का आरोप लगाया गया था।

बचाव पक्ष के वकील ने यह भी कहा कि पति की अच्छी आय के बावजूद तीनों महिलाओं को आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही थी और आरोपी की मानसिक स्थिति भी बेहद नाजुक है।

उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम की धारा 115 का हवाला देते हुए कहा कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को गंभीर तनाव में माना जाता है और उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए 11 अप्रैल के अपने आदेश में कहा कि आरोप गंभीर हैं और जांच अभी ऐसे चरण में है, जब प्रमुख फोरेंसिक रिपोर्ट अभी नहीं आई है। अदालत ने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी को उचित ठहराते हुए कहा कि तीनों महिलाएं बंद घर के अंदर मिली थीं और जबरन प्रवेश के कोई संकेत नहीं थे, ऐसे में सतर्कता के साथ जांच करना जरूरी है।

भाषा सिम्मी वैभव

वैभव


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