विवाहित युवतियों की अप्राकृतिक मौत की त्वरित पुलिस जांच जरूरी है: दिल्ली उच्च न्यायालय
विवाहित युवतियों की अप्राकृतिक मौत की त्वरित पुलिस जांच जरूरी है: दिल्ली उच्च न्यायालय
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, तीन जून (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कथित दहेज हत्या के एक मामले में पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज किये जाने में आठ माह की देरी पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि विवाहित युवतियों की अप्राकृतिक मौत के मामलों में त्वरित और गहन पुलिस जांच की आवश्यकता होती है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने ब्याह के महज छह माह के अंदर 25-वर्षीय एक युवती की दहेज मौत के एक मामले में उसके पति और ससुराल वालों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने में ‘युवती की शादी की पूरी अवधि से भी अधिक समय लगा’ और यह एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण हकीकत’ है कि मृत महिला के पिता को न्यायिक आदेश के तहत प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ‘दर-दर भटकना’ पड़ा।
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज किये जाने में देरी के परिणामों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उसने उम्मीद जताई कि भविष्य में, शादी के तुरंत बाद युवतियों की अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश के अनुरोध वाले आवेदनों पर मजिस्ट्रेट अदालतों द्वारा ‘अधिक तत्परता’ से विचार किया जाएगा, विशेषकर जब दहेज से संबंधित उत्पीड़न के आरोप हों।
वर्तमान मामले में, मृत महिला के पति ने दो जुलाई, 2025 को उसके पिता को सूचित किया कि सीढ़ियों से गिरने के बाद उनकी बेटी अस्पताल में भर्ती है। हालांकि, अस्पताल पहुंचने पर पिता को गड़बड़ी का संदेह हुआ।
बाद में पता चला कि महिला ने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसने तीन जुलाई, 2025 को दम तोड़ दिया, जबकि मजिस्ट्रेट न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इस वर्ष 13 फरवरी को प्राथमिकी दर्ज की गई।
पति और ससुराल वालों ने प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी एवं मृत महिला के पिता द्वारा कार्यकारी मजिस्ट्रेट को दिए गए अपने पहले बयान में किसी भी तरह के ‘स्पष्ट एवं विस्तृत आरोप’ न लगाने के आधार पर अग्रिम जमानत मांगी।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने एक जून को अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता पिता ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट को बयान उसी दिन दिया था जब उनकी बेटी ‘शवगृह में मृत पड़ी थी’ और उनसे क्रूरता या दहेज की मांग की हर घटना का ब्योरा देने की अपेक्षा करना ‘मानवीय व्यवहार की वास्तविकताओं से परे’ है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि मृत महिला के पिता द्वारा मामले को जल्द से जल्द अधिकारियों के संज्ञान में लाने के लिए कदम उठाने के बावजूद, कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिसके कारण उन्हें मजिस्ट्रेट अदालत में मामला दायर करना पड़ा तथा वहां भी उनकी याचिका ‘काफी समय’ तक लंबित रही।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले में जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और मृत महिला के पति एवं ससुराल वालों की हिरासत में पूछताछ को अनुचित नहीं कहा जा सकता।
भाषा राजकुमार सुरेश
सुरेश

Facebook


