दिल्ली दंगा मामला: छह आरोपी बरी, जांच में ‘छेड़छाड़’ के मामले में पुलिस को कार्रवाई का आदेश

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दिल्ली दंगा मामला: छह आरोपी बरी, जांच में ‘छेड़छाड़’ के मामले में पुलिस को कार्रवाई का आदेश

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  • Publish Date - February 3, 2026 / 06:14 PM IST,
    Updated On - February 3, 2026 / 06:14 PM IST

नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने 2020 में हुए दंगों के मामले में छह आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में ‘बुरी तरह विफल’ रहा।

अदालत ने पुलिस पर रिकॉर्ड में हेरफेर करने और ‘मनगढ़ंत’ आरोप-पत्र दाखिल करने का आरोप लगाया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने प्रेम प्रकाश उर्फ ​​काके, इशू गुप्ता, राजकुमार उर्फ ​​शिवान्या, अमित उर्फ ​​अन्नू, राहुल उर्फ ​​गोलू और हरिओम शर्मा को बरी करने का आदेश दिया।

अदालत, दंगों के दौरान इन सभी के हिंसक भीड़ का हिस्सा होने के आरोप से संबंधित मामले की सुनवाई कर रही थी।

न्यायाधीश ने 31 जनवरी को दिये आदेश में कहा, “अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपना मामला साबित करने में बुरी तरह विफल रहा और सभी आरोपियों को उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों से बरी किया जाता है।”

दिल्ली में 25 फरवरी, 2020 को हुए दंगों के दौरान सुदामापुरी स्थित अजीजिया मस्जिद के पास आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाओं से संबंधित एक मामले में सभी छह आरोपियों पर आरोप लगाए गए थे।

आरोपियों पर तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे, जिनमें दंगा, आगजनी, हत्या का प्रयास, चोरी और साजिश शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि यह मामला मनगढ़ंत बयानों और अविश्वसनीय गवाहियों पर आधारित है।

अदालत ने निर्देश दिया कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए आदेश की एक प्रति दिल्ली पुलिस आयुक्त को सौंपी जाए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मुझे यह कहना होगा कि जिस तरीके से रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई है, वह निगरानी तंत्र की पूर्ण विफलता को दर्शाता है, क्योंकि मनगढ़ंत आरोपपत्र निगरानी अधिकारियों द्वारा दायर किया गया था।’’

अदालत ने पाया कि कई गवाहों ने शुरू में कहा था कि उन्होंने किसी दंगाई को नहीं देखा, लेकिन बाद में उन्होंने कुछ आरोपियों की पहचान नाम से करने का दावा किया।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष का मामला उन गवाहों के आधार पर गढ़ा गया है, जिन्होंने अपने शुरुआती बयानों के अनुसार किसी भी दंगाई को नहीं देखा था, लेकिन बाद में अपने बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और मनगढ़ंत बातें बताईं।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत वीडियो साक्ष्य कानून के अनुसार सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि इसमें साक्ष्य अधिनियम के तहत अनिवार्य प्रमाणीकरण का अभाव है।

भाषा जितेंद्र सुरेश

सुरेश