प्रदर्शनकारियों पर हमले के मामले में न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अगुवाई में एसआईटी के गठन की मांग
प्रदर्शनकारियों पर हमले के मामले में न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अगुवाई में एसआईटी के गठन की मांग
नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को जोरदार मांग की गई कि नीट प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर कथित अत्याचारों के सिलसिले में विभिन्न राज्यों के पुलिस विभागों के आला अधिकारियों तक की जिम्मेदारी तय करने के लिए उच्चतम न्यायालय के किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाए।
निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत पर जोर देते हुए शीर्ष अदालत ने कई अंतरिम निर्देश जारी किए। न्यायालय ने राज्यों को हालिया आंदोलन में शामिल हुए लोगों के खिलाफ कोई भी सख्त कार्रवाई करने से रोक दिया और निर्देश दिया कि 18 साल से कम उम्र के लोगों को रिहा किया जाए, बशर्ते उनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड न हो।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता समेत कई वकीलों की दलीलें सुनीं।
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, गोपाल शंकरनारायणन, श्याम दीवान, वृंदा ग्रोवर और प्रशांत भूषण उन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा बर्बरता किये जाने का आरोप लगाया था।
इस बार सीजेआई ने खुद पुलिस के कथित अत्याचारों के कुछ मामलों का उल्लेख करना शुरू किया।
सीजेआई ने कहा, “एक मामला पैलेट गन के इस्तेमाल का है, जिससे एक युवक घायल हुआ। फिर इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल का मामला है, जिससे जानलेवा चोट आईं… इसके अलावा वीडियो बनाने वालों के घायल होने का मुद्दा भी है।”
उन्होंने कहा, “एक पुलिस अधिकारी पर भी हमला हुआ, जब वह सादे कपड़ों में था… एक महिला को भी पुलिस अधिकारी ने थप्पड़ मारा और पुलिस के हाथों छेड़छाड़ के कुछ मामले भी सामने आए हैं।”
सीजेआई ने कहा कि इस मामले में लंबी दलीलों की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि छात्रों द्वारा अपनी मांगों को लेकर किया गया प्रदर्शन शांतिपूर्ण और संवैधानिक अधिकार के अनुरूप था।
सीजेआई ने कहा, ‘जिन लोगों ने इसे रोकना चाहा, उन्होंने बल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया। फिर पुलिस अधिकारियों के परिवारों से जुड़ी कुछ शिकायतें भी हैं। उनका कहना है कि कुछ अन्य लोग किसी एजेंडे के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए और सह-आयोजक बनने की कोशिश की। तो फिर इन सभी मामलों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?”
इसके बाद शंकरनारायणन ने मामले में दलीलें पेश कीं और कहा कि यह मामला पूरे देश में हुए प्रदर्शनों से जुड़ा है।
उन्होंने कहा, “ये घटनाएं केवल दिल्ली या जंतर-मंतर तक सीमित नहीं हैं। इनमें बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के आगरा, पश्चिम बंगाल और कई अन्य राज्यों में हुए प्रदर्शन और उनसे जुड़ी घटनाएं शामिल हैं।”
उन्होंने कहा कि इन प्रदर्शनों से जुड़ी कई घटनाएं हुई हैं और विभिन्न याचिकाओं में पुलिस की ज्यादतियों के आरोप लगाए गए हैं, जिनमें लाठीचार्ज, पैलेट गन का इस्तेमाल, छात्रों के साथ बर्बरता और पुलिस की अन्य कार्रवाइयां शामिल हैं।
उन्होंने कहा, “कानूनी रूप से धारा 144 आदि के तहत आदेश होना चाहिए। जंतर-मंतर के लिए ऐसा कुछ नहीं था। रामलीला मैदान प्रदर्शन के दौरान भी ऐसे मामले आए थे। तब इसे रोकने के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए थे।”
अदालत ने कहा कि याचिकाओं में लगाए गए आरोपों के लिए ‘गहन, स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी’ जांच जरूरी है और यदि कोई ज्यादती हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
सीजेआई ने कहा, “पूरी तरह स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। जिसने भी ज्यादती की है…कानून अपना काम करेगा। अगर जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो जांच का कोई मतलब नहीं।”
न्यायालय ने प्रदर्शनों को छात्रों का ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ बताया और कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस्तेमाल किए गए बल की प्रकृति पर ध्यान देना जरूरी है।
सीजेआई ने कहा, “हमें यह देखना होगा कि किस तरह के आंसू गैस आदि का इस्तेमाल किया गया और क्या इसकी अनुमति होनी चाहिए… लोकतंत्र में आंदोलन होना स्वाभाविक है। अब समय आ गया है कि इन सभी सिद्धांतों को एक साथ रखकर और विस्तारित किया जाए।”
शंकरनारायणन ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के तय नियमों का पालन किए बिना बल का इस्तेमाल किया और अधिकारियों ने मनमाने तरीके से कार्रवाई की।
उन्होंने न्यायालय से शीर्ष अदालत के किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने की मांग की। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की सादी वर्दीधारियों द्वारा पिटाई और पुलिसकर्मियों द्वारा एक कार के शीशे तोड़ने की घटनाओं का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “इन लोगों ने ऐसा व्यवहार किया, जैसे उन्हें खुली छूट मिली हो। हम चाहते हैं कि जिम्मेदारी ऊपर तक तय की जाए। जब तक यह अदालत ऐसा नहीं करेगी, पुलिस को लगेगा कि वह बच सकती है। एसआईटी की अध्यक्षता इस अदालत के पूर्व न्यायाधीश को करनी चाहिए। इससे कम कुछ भी ठीक नहीं होगा।”
दीवान और एक अन्य वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने उन रिपोर्ट और वीडियो सबूतों का हवाला दिया, जिनमें निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, आंसू गैस और लाठीचार्ज के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया था।
दीवान ने यह आरोप भी लगाया कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी हमलों में शामिल थे। उन्होंने महिलाओं, बच्चों और पत्रकारों से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, “प्रदर्शनकारियों पर बिजली का झटका देने वाले हथियारों के इस्तेमाल से जुड़ी खबरें हैं। राजधानी में इलेक्ट्रिक शील्ड का भी इस्तेमाल किया गया।”
उन्होंने कहा, “लाठीचार्ज और आंसू गैस के जरिए अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया गया। इसके लिए एक प्रक्रिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसका उल्लंघन किया गया।”
न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में आंदोलन और प्रदर्शन होना स्वाभाविक है। न्यायालय ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को नियंत्रित करने वाले मौजूदा दिशा-निर्देशों की समीक्षा और उन्हें मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पुलिस बलों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए जाने चाहिए, जिससे तुरंत बल प्रयोग की जरूरत कम हो सके।
आलम ने आरोप लगाया कि एक पुलिसकर्मी ने प्रदर्शनकारियों पर एके-47 का इस्तेमाल किया और अब राज्य पुलिस कह रही है कि उसे निलंबित कर दिया गया है।
शंकरनारायणन ने कहा, “केवल उच्चतम न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश को ही इस एसआईटी का प्रमुख बनाया जाना चाहिए। इससे कम कुछ भी ठीक नहीं होगा।”
सीजेआई ने संकेत दिया कि देशव्यापी स्तर पर मामले को देखने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जा सकती है।
भाषा जोहेब दिलीप
दिलीप

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