गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने और ‘डिलीवरी इन टैन मिनट’ को अपराध घोषित करने की मांग
गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने और 'डिलीवरी इन टैन मिनट' को अपराध घोषित करने की मांग
जयपुर, 18 जनवरी (भाषा) देश में गिग वर्कर्स की संख्या 2030 तक ढाई करोड़ तक पहुंचने की संभावना के बीच अर्थशास्त्रियों ने उन्हें बेहतर सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने और ‘डिलीवरी इन टैन मिनट’ के चलन को अपराध घोषित करने का सुझाव दिया।
शनिवार को 19वें जयपुर साहित्योत्सव में ‘द गिग इकॉनामी’ सत्र को संबोधित करते हुए प्रख्यात अर्थशास्त्री, वरिष्ठ नीति निर्माता और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य राकेश मोहन ने गिग वर्कर्स की समस्याओं का जिक्र करते हुए कि देश में 2021 में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी जो 2025 में एक करोड़ 40 लाख हो चुकी है और 2030 तक इसके बढ़कर ढाई करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।
उन्होंने डिलीवरी कंपनियों द्वारा ‘डिलीवरी इन टैन मिनट’ की अवधारणा को अपराध घोषित करने के साथ ही गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने के लिए ऐप के जरिए होने वाली सामान की प्रत्येक डिलीवरी पर उपकर लगाए जाने का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा कि उपकर से प्राप्त इस धनराशि पर पूरी तरह गिग वर्कर का अधिकार होगा और यह राशि राष्ट्रीय पेंशन जैसी किसी योजना के तहत खाते में जमा कराई जा सकती है।
केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने पिछले दिनों कहा था कि डिलीवरी कंपनियों ने 10 मिनट में डिलीवरी का अपना वादा खत्म कर दिया है।
‘सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस’ (सीएसईपी) के मानद अध्यक्ष राकेश मोहन ने कहा कि यह आज देश का प्रमुख रोजगार सृजक क्षेत्र बनकर उभरा है और न केवल विकासशील देशों में बल्कि विकसित देशों में बड़ी संख्या में गिग वर्कर्स कार्यरत हैं।
मोहन ने इन कामगारों को यूनियनों द्वारा सशक्त बनाने से पहले इन्हें संगठित करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा कि गिग वर्कर्स के लिए कामकाज के न तो घंटे तय हैं, न कोई शिकायत निवारण तंत्र है और असुरक्षित कामकाजी माहौल के बावजूद इनके लिए कोई दुर्घटना बीमा या सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था न होना चिंताजनक है।
शहरी अर्थव्यवस्था और विकास पर तीन किताबें लिख चुके मोहन ने कहा कि ऐप आधारित सेवाओं के आगमन के बाद इन गिग वर्कर्स के पास सेवा से इंकार करने की स्वतंत्रता भी छीन ली गई है।
‘ओटीपी प्लीज’ नामक पुस्तक की लेखिका वंदना वासुदेवन ने कहा कि इस नयी व्यवस्था में हम तेजी से सामाजिक संपर्क से बाहर होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि डिलीवरी कंपनियों के पास कोई शिकायत निवारण तंत्र नहीं होने से गिग वर्कर्स के साथ ही उपभोक्ता भी बड़ी परेशानियों का सामना कर रहे हैं, जिसके चलते वे एक खास किस्म की बेचैनी का शिकार हो रहे हैं।
वंदना वासुदेवन ने निजी अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि ई-कॉमर्स और गिग वर्क कैसे खरीदारों, विक्रेताओं और कर्मचारियों की जिंदगी पर असर डालते हैं। साथ ही उन्होंने नीति निर्माताओं से गिग इकॉनमी को अधिक न्यायसंगत बनाने की अपील की।
सत्र में भारतीय उद्योग जगत की शीर्ष संस्था नैस्काम से जुड़ीं केतकी कार्णिक ने कंपनियों द्वारा गैर आनुपातिक मुनाफा कमाए जाने पर चिंता जताते हुए गिग वर्कर्स को उनके श्रम के अनुपात में वेतन देने का सुझाव दिया।
लेखक एवं ब्रांड रणनीतिकार संतोष देसाई ने कहा कि गिग इकॉनामी में कंपनियों समेत हर कोई भारी मुनाफा कमा रहा है लेकिन इस उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले गिग वर्कर्स को बहुत मामूली वेतन मिलता है।
भाषा नरेश संतोष जोहेब
जोहेब

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