रासुका के तहत हिरासत आरोपी के इकबालिया बयान के आधार पर नहीं हो सकती: न्यायालय

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रासुका के तहत हिरासत आरोपी के इकबालिया बयान के आधार पर नहीं हो सकती: न्यायालय

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  • Publish Date - September 29, 2026 / 07:43 PM IST,
    Updated On - September 29, 2026 / 07:43 PM IST

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि पुलिस अधिकारी के समक्ष आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकता।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एहतियातन हिरासत को हमेशा एक असाधारण उपाय माना गया है और इसलिए इसका इस्तेमाल अत्यंत सावधानी से तथा केवल उन दुर्लभतम मामलों में किया जाना चाहिए, जहां परिस्थितियां वास्तव में ऐसी कार्रवाई को उचित ठहराती हों।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने कहा कि पुलिस के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान विश्वसनीय साक्ष्य नहीं माना जाता और आमतौर पर उसे बयान देने वाले व्यक्ति के खिलाफ विचार से बाहर रखा जाता है।

पीठ ने कहा, ‘हमारा सुविचारित मत है कि पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान अपने आप में और उसके समर्थन में किसी स्वतंत्र सामग्री के अभाव में, एहतियातन हिरासत के आदेश को कायम रखने के लिए आवश्यक व्यक्तिपरक संतुष्टि बनाने का आधार नहीं बन सकता।’

पीठ ने कहा, ‘इस तरह की प्रक्रिया की अनुमति देना उस हिरासत आदेश को ऐसे आधार पर टिकाने की अनुमति देना होगा, जिसे कानून स्वयं संदेह की दृष्टि से देखता है और साक्ष्य के रूप में विचार से बाहर रखता है।’

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी ने इकबालिया बयान के अलावा अन्य सामग्री पर भी भरोसा किया है, तो अदालत को यह देखना होगा कि क्या उन अन्य सामग्रियों के आधार पर हिरासत आदेश को बरकरार रखा जा सकता है।

पीठ ने कहा, ‘हम दोहराते हैं कि हिरासत में लिये गए व्यक्ति का महज इकबालिया बयान (किसी अन्य ठोस आधार या सामग्री के बिना) हिरासत आदेश पारित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।’

पीठ ने मुल्ला अफरोज की एहतियातन हिरासत रद्द करते हुए कहा, ‘यह बात मौजूदा मामले के तथ्यों में विशेष रूप से लागू होती है, जहां हिरासत में लिये गए व्यक्ति ने लगातार कहा है कि उसका इकबालिया बयान धमकी और यातना देकर हासिल किया गया।’

उत्तर प्रदेश पुलिस ने संभल में 2024 में हुई कथित सांप्रदायिक हिंसा में भूमिका के आरोप में अक्टूबर 2025 में अफरोज के खिलाफ कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अफरोज के खिलाफ हिरासत आदेश 13 अक्टूबर, 2025 को पारित किया गया था और जिस घटना में वह आरोपी था, उससे जुड़े सभी मामलों में जमानत मिलने के बावजूद उसे काफी समय तक स्वतंत्रता से वंचित रहना पड़ा।

पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में प्रक्रिया ही सजा बन गई। अदालत ने अवैध एहतियातन हिरासत आदेश पारित करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

पीठ ने कहा, ‘मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों, विशेष रूप से अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की स्थिति, हिरासत प्राधिकारी द्वारा भरोसा की गई सामग्री की प्रकृति और अपीलकर्ता के पक्ष में पारित कई जमानत आदेशों को देखते हुए हम हिरासत आदेश को कानूनी और वैध मानने के लिए स्वयं को राजी नहीं कर पा रहे हैं।’

पीठ ने कहा, ‘‘हिरासत प्राधिकारी द्वारा भरोसा की गई सामग्री और उसके द्वारा दर्ज की गई संतुष्टि के बीच आवश्यक संबंध स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है। हिरासत प्राधिकारी द्वारा भरोसा किए गए आधारों की अमान्यता पर हमारे निष्कर्ष के मद्देनजर, हमारे लिए यह विचार करना आवश्यक नहीं रह जाता कि जिन अपराधों में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को आरोपी बनाया गया है, वे राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने या यहां तक कि सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान पैदा करने की श्रेणी में आते हैं या नहीं।’

फैसला सुनाते समय न्यायमूर्ति दत्ता ने अपने उस विधि क्लर्क को भी श्रद्धांजलि दी, जिनका 27वां जन्मदिन आने से चार दिन पहले निधन हो गया था।

रासुका केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे व्यक्तियों को हिरासत में रखने का अधिकार देता है, जिनके बारे में आशंका हो कि वे ‘भारत की रक्षा के प्रतिकूल’ गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने है, हालांकि इसे पहले भी समाप्त किया जा सकता है।

रासुका स्थानीय प्रशासन द्वारा लगाया जा सकता है और इसे उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले सलाहकार बोर्ड से मंजूरी मिलनी आवश्यक होती है। चूंकि यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि एहतियातन हिरासत होती है, इसलिए हिरासत में लिये गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करना अनिवार्य नहीं होता।

संभल में नवंबर 2024 में तनाव उस समय उत्पन्न हुआ था, जब शाही जामा मस्जिद का अदालत के आदेश पर सर्वेक्षण किया जा रहा था। यह सर्वेक्षण उन दावों के बाद कराया गया था कि उस स्थान पर पहले हरिहर मंदिर था।

चौबीस नवंबर को सर्वेक्षण के दूसरे चरण के दौरान प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों की सुरक्षा बलों से झड़प हो गई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हुए थे।

भाषा अमित नरेश

नरेश