पित्ताशय के कैंसर का पता लगाने में मददगार ‘बायोमार्कर’ की खोज

पित्ताशय के कैंसर का पता लगाने में मददगार ‘बायोमार्कर’ की खोज

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  • Publish Date - January 10, 2026 / 07:25 PM IST,
    Updated On - January 10, 2026 / 07:25 PM IST

तेजपुर, 10 जनवरी (भाषा) असम के तेजपुर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने खून में मौजूद ऐसे विशिष्ट रासायनिक संकेतकों (बायोमार्कर) की पहचान करने का दावा किया है, जिनसे पित्ताशय के कैंसर के उन मामलों के बीच अंतर किया जा सकता है, जो पथरी और बिना पथरी दोनों के होते हैं। यह खोज पित्ताशय के कैंसर का समय रहते पता लगाने की उम्मीद जगाती है।

विश्वविद्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि शोधकर्ताओं ने रक्त-आधारित विशिष्ट ‘मेटाबोलिक संकेतकों’ की पहचान की है, जो पित्ताशय के कैंसर के निदान में मददगार ‘बायोमार्कर’ के रूप में काम कर सकते हैं।

पित्ताशय का कैंसर सबसे घातक जठरांत्रिय (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) कैंसर में से एक है। पूर्वोत्तर भारत में इसके असमान रूप से अधिक मामले सामने आए हैं और यह क्षेत्र में तीसरा सबसे आम कैंसर है।

पित्ताशय का कैंसर अपने धीमे प्रसार के लिए जाना जाता है और ज्यादातर मरीजों में यह गंभीर चरण में पहुंचने के बाद ही पकड़ में आता है, जिससे इलाज के विकल्प बहुत सीमित हो जाते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, पित्त की थैली में पथरी को पित्ताशय के कैंसर का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, लेकिन इस समस्या के शिकार हर व्यक्ति में यह कैंसर नहीं पनपता और बड़ी संख्या में पित्ताशय के कैंसर के ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें मरीज के पित्त की थैली में पथरी की शिकायत से जूझने का कोई इतिहास नहीं होता।

असम में पित्ताशय के कैंसर के मामलों में और वृद्धि होने का अनुमान है, जो शीघ्र निदान रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

तेजपुर विश्वविद्यालय के आणविक जीवविज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर पंकज बराह और शोधार्थी सिनमोयी बरुआ के नेतृत्व में किए गए इस अनुसंधान ने रक्त-आधारित सरल जांच विकसित करने की उम्मीद जगाई है, जो पित्ताशय के कैंसर के शीघ्र निदान में मददगार साबित हो सकती है।

यह अनुसंधान अमेरिकन केमिकल सोसायटी के ‘जर्नल ऑफ प्रोटीओम रिसर्च’ में प्रकाशित किया गया है।

बराह ने कहा, “हमारे अनुसंधान से पता चलता है कि खून में मौजूद क्रिएटिनिन (चयापचय क्रिया के दौरान पैदा होने वाला ‘मेटाबोलाइट’) में बदलाव के आधार पर पथरी की शिकायत वाले और बिना पथरी वाले पित्ताशय के कैंसर के मामलों में स्पष्ट रूप से अंतर किया जा सकता है। इससे रक्त-आधारित सरल जांच विकसित करने की संभावना बढ़ जाती है, जो शीघ्र निदान में सहायक हो सकते हैं।”

बराह के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत में अपनी तरह के पहले अनुसंधान में तीन समूह के मरीजों के खून के नमूनों का विश्लेषण किया गया। पहला-पित्ताशय के कैंसर से पीड़ित ऐसे मरीज, जिन्हें पित्त की थैली में पथरी की शिकायत नहीं थी। दूसरा-पित्ताशय के कैंसर के शिकार ऐसे मरीज, जिन्हें पित्त की थैली में पथरी की शिकायत थी। तीसरा, ऐसे मरीज, जो पित्त की थैली में पथरी की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें पित्ताशय का कैंसर नहीं है।

बराह ने बताया कि उनकी टीम ने अत्याधुनिक ‘मेटाबोलोमिक’ प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर पित्त की थैली में पथरी रहित कैंसर के मामलों में 180 और पित्त की थैली में पथरी से जुड़े कैंसर के मामलों में 225 उत्परिवर्तित ‘मेटाबोलाइट’ की पहचान की।

उन्होंने बताया कि दोनों तरह के कैंसर के मामलों में बेहतर निदान परिणाम वाले विशिष्ट ‘बायोमार्कर’ की पहचान की गई, जिनमें ट्यूमर के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले कई पित्त अम्ल और अमीनो अम्ल व्युत्पन्न शामिल थे।

भाषा पारुल दिलीप

दिलीप